This is default featured slide 1 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

This is default featured slide 2 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

This is default featured slide 3 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

This is default featured slide 4 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

This is default featured slide 5 title

Go to Blogger edit html and find these sentences.Now replace these sentences with your own descriptions.This theme is Bloggerized by Lasantha Bandara - Premiumbloggertemplates.com.

February 26, 2026

ओरल कैंसर से बचाव के लिए जागरूकता और समय पर जांच है सबसे बड़ी ताकत


ओरल कैंसर से बचाव के लिए जागरूकता और समय पर जांच है सबसे बड़ी ताकत

रेवाड़ी: ओरल कैंसर आज भारत में सबसे आम और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। यह काफी हद तक रोका जा सकता है और अगर समय पर पहचान हो जाए तो इसका सफल इलाज भी संभव है। फिर भीदेर से पहचान और जागरूकता की कमी के कारण यह कैंसर से होने वाली मौतों का एक बड़ा कारण बना हुआ है। इसके कारणोंशुरुआती लक्षणों और जांच की प्रक्रिया को समझना बेहतर परिणामों के लिए बेहद जरूरी है।


ओरल कैंसर उस कैंसर को कहा जाता है जो मुंह के किसी भी हिस्से में विकसित हो सकता है। इसमें होंठजीभमुंह का फर्श (जीभ और निचले जबड़े की हड्डी के बीच का हिस्सा)गालों का अंदरूनी भागऊपरी और निचले जबड़े की हड्डियांहार्ड पैलेट (ऊपरी तालु) और रेट्रोमोलर ट्राइगोनजो आखिरी दाढ़ के पीछे स्थित त्रिकोणीय क्षेत्र होता हैशामिल हैं।


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल द्वारका के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी (हेड एंड नेक) विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. शिल्पी शर्मा ने बताया “भारत में पुरुषों में यह सबसे आम कैंसर है और महिलाओं में चौथा सबसे आम कैंसर है। देश के कुछ क्षेत्रों में यह महिलाओं में भी प्रमुख कैंसरों में से एक है। हर साल लगभग एक लाख नए मामले सामने आते हैंजो इसे एक बड़ी पब्लिक हेल्थ समस्या बनाते हैं। दुर्भाग्य सेलगभग 60–70 प्रतिशत मरीज एडवांस स्टेज में अस्पताल पहुंचते हैंजिससे जीवित रहने की संभावना काफी कम हो जाती है। बड़ी संख्या में मरीजों की मृत्यु निदान के एक वर्ष के भीतर ही हो जाती हैजिसका मुख्य कारण देर से पहचान है। ओरल कैंसर का सबसे बड़ा कारण तंबाकू का सेवन है। तंबाकू को चबाकर (मावाखैनीपानपान मसालागुटखा)पीकर (बीड़ीसिगरेटहुक्का) या मंजन/पेस्ट के रूप में जैसे मिश्री के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। सुपारी (अरेका नट)जिसे अकेले या तंबाकू के साथ खाया जाता हैभी एक बड़ा रिस्क फैक्टर है। शराब का सेवनखासकर तंबाकू के साथकैंसर का खतरा कई गुना बढ़ा देता है। नुकीले दांतों या ठीक से फिट होने वाले डेंचर से होने वाली लगातार चोटखराब ओरल हाइजीनह्यूमन पैपिलोमा वायरस (HPV) संक्रमण और पोषण की कमी भी इस बीमारी से जुड़ी हुई हैं।


डॉ. शिल्पी ने आगे बताया “समय पर पहचान जीवन बचाने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऐसे चेतावनी संकेत जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिएउनमें मुंह का भरने वाला घावलाल या सफेद धब्बेबिना कारण बढ़ने वाली गांठ जो छूने पर खून करेदांतों का अचानक हिलनाडेंचर का फिट होनाखाने या निगलने में कठिनाईबोलने में बदलावलगातार गले में दर्द जो कान तक पहुंचेगर्दन में सूजन या चेहरे पर बिना कारण घाव शामिल हैं। यदि कोई भी लक्षण दो सप्ताह से अधिक समय तक बना रहे तो तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। कुछ स्थितियां संभावित रूप से कैंसर में बदल सकती हैंजिन्हें पोटेंशियली मैलिग्नेंट डिसऑर्डर कहा जाता है। ल्यूकोप्लाकिया मुंह के अंदर सफेद धब्बे के रूप में दिखाई देता है और अक्सर तंबाकू सेवन करने वालों में पाया जाता है। एरिथ्रोप्लाकिया लाल धब्बे के रूप में दिखता है और इसमें कैंसर में बदलने का खतरा और अधिक होता है। ओरल सबम्यूकस फाइब्रोसिस (OSMF), जो गुटखा और सुपारी खाने वालों में आम हैधीरे-धीरे मुंह खोलने की क्षमता कम कर देता है और कैंसर का खतरा बढ़ाता है। इरोसिव लाइकेन प्लानसजो एक पुरानी सूजन संबंधी बीमारी है और त्वचा या म्यूकस मेम्ब्रेन को प्रभावित करती हैभी कैंसर में बदल सकती है। इन स्थितियों की समय पर जांच और इलाज बेहद जरूरी है।


ओरल कैंसर की पहचान सबसे पहले ऑन्कोलॉजिस्ट द्वारा की गई पूरी क्लिनिकल जांच से शुरू होती है। यदि संदेह होता है तो बायोप्सी की जाती हैजिससे कैंसर की पुष्टि और उसके प्रकार की जानकारी मिलती है। सीटी स्कैनएमआरआई या PET-CT जैसी इमेजिंग जांच से यह पता लगाया जाता है कि ट्यूमर कितना फैला है और क्या यह आसपास के टिश्यू या लिंफ नोड्स तक पहुंच चुका है। क्लिनिकल और रेडियोलॉजिकल जांच के आधार पर कैंसर को अर्ली स्टेज (स्टेज I या II) या एडवांस स्टेज (स्टेज III या IV) में वर्गीकृत किया जाता है।


ओरल कैंसर का इलाज संभव हैखासकर जब इसकी पहचान शुरुआती स्टेज में हो जाए। एडवांस स्टेज में भी इलाज के विकल्प उपलब्ध हैंलेकिन जल्दी पहचान होने पर परिणाम बेहतर होते हैं। जागरूकतानियमित ओरल जांचतंबाकू और अत्यधिक शराब से परहेज तथा किसी भी संदिग्ध लक्षण पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना इस बीमारी के बोझ को कम करने के सबसे प्रभावी तरीके हैं।


समय पर पहचान जीवन बचा सकती है। रोकथाम और सही समय पर जांच ही ओरल कैंसर के खिलाफ हमारी सबसे मजबूत रणनीति है।

February 24, 2026

भारत में किडनी ट्रांसप्लांट को नई दिशा दे रही रोबोटिक सर्जरी

भारत में किडनी ट्रांसप्लांट को नई दिशा दे रही रोबोटिक सर्जरी

लखनऊ: किडनी ट्रांसप्लांट एंड-स्टेज रीनल डिजीज से पीड़ित मरीजों के लिए गोल्ड स्टैंडर्ड उपचार माना जाता है। परंपरागत रूप से ओपन सर्जरी लंबे समय से सफलतापूर्वक की जाती रही है और आज भी कई केंद्रों पर प्रचलित है। हालांकिओपन सर्जरी के साथ कई चुनौतियाँ जुड़ी होती हैंजैसे सर्जरी के बाद अधिक दर्दरिकवरी में अधिक समयकॉस्मेटिक परिणामों में कमीघाव में संक्रमण का खतराविशेषकर डायबिटीज और मोटापे से ग्रस्त मरीजों में।

 

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलसाकेत के यूरोलॉजीरीनल ट्रांसप्लांट एवं रोबोटिक्सयूरो-ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरमैन डॉ. अनंत कुमार ने बताया “इन समस्याओं को कम करने के लिए हाल के वर्षों में रोबोटिक प्लेटफॉर्म पर आधारित मिनिमली इनवेसिव सर्जरी तकनीक दुनिया भर में तेजी से स्थापित हो रही है। हम देश के उन चुनिंदा केंद्रों में से हैं जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में इस तकनीक को अपनाया हैताकि वैश्विक मानकों के अनुरूप मरीजों को अत्याधुनिक उपचार उपलब्ध कराया जा सके। रोबोटिक तकनीक सर्जन को बेहतर 3D विज़न प्रदान करती है और छोटी चीरा (इंसिजन) के माध्यम से सर्जरी करने की सुविधा देती है। इसका परिणाम यह होता है कि मरीजों को कम दर्द होता है और वे तेजी से स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट पाते हैं। रोबोटिक ट्रांसप्लांट में लिंफ फ्लूड के जमा होने (लिंफोसील) की संभावना भी लगभग नगण्य होती है।

 

डॉ. अनंत ने आगे बताया “हालांकि रोबोटिक ट्रांसप्लांट में ऑपरेशन का समय ओपन सर्जरी की तुलना में थोड़ा अधिक हो सकता हैलेकिन इसके लाभ संभावित जोखिमों से कहीं अधिक हैं। अस्पताल में रहने की अवधि लगभग ओपन ट्रांसप्लांट के समान ही रहती है। अधिकांश मामलों में किडनी का कार्य तुरंत शुरू हो जाता है और पेशाब की मात्रा अच्छी रहती है। हमारे कुछ मरीजों में छाती का संक्रमण और एक मरीज में किडनी रिजेक्शन देखा गयाजो रोबोटिक तकनीक से संबंधित नहीं थे और ओपन सर्जरी में भी हो सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी मरीज में जानलेवा जटिलता नहीं देखी गई और अधिकांश मरीज अगले ही दिन चलने-फिरने लगे तथा सामान्य आहार लेने लगे। कम दर्द के कारण वे जल्दी ही अपनी दिनचर्या में लौट आए। कॉस्मेटिक परिणाम ओपन सर्जरी की तुलना में कहीं बेहतर और लगभग अतुलनीय हैं।

 

रोबोटिक सर्जरी की प्रमुख सीमा इसकी लागत हैक्योंकि यह ओपन ट्रांसप्लांट की तुलना में अधिक महंगी होती है। फिर भीविशेषकर मोटापे से ग्रस्त मरीजों में जहां घाव से जुड़ी जटिलताएँ लगभग सामान्य होती हैंरोबोटिक सर्जरी एक बड़ी राहत साबित हो रही है। मैक्स में हम नियमित रूप से इस प्रकार की रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी कर रहे हैं और मरीजों को सुरक्षित आधुनिक उपचार उपलब्ध करा रहे हैं।