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May 25, 2026

ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया: चेहरे के तेज दर्द को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया: चेहरे के तेज दर्द को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

मुरादाबाद: ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया (TN) एक गंभीर न्यूरोलॉजिकल स्थिति है, जिसमें ट्राइजेमिनल नर्व प्रभावित हो जाती है। यह नर्व चेहरे से मस्तिष्क तक संवेदनाओं के संकेत पहुंचाने का काम करती है। जब इस नर्व पर असर पड़ता है, तो मरीज को चेहरे में बेहद तेज और असहनीय दर्द महसूस हो सकता है। इसे दुनिया की सबसे दर्दनाक बीमारियों में से एक माना जाता है। यह समस्या अक्सर तब होती है जब मस्तिष्क से निकलने वाली नर्व पर कोई ब्लड वेसल्स दबाव डालती है, जिससे नर्व की सुरक्षात्मक परत (मायलिन शीथ) क्षतिग्रस्त हो जाती है और नर्व सामान्य रूप से काम नहीं कर पाती। कुछ मामलों में मल्टीपल स्क्लेरोसिस, ट्यूमर, चेहरे की चोट या अन्य अज्ञात कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा के न्यूरोसर्जरी, न्यूरो क्रिटिकल केयर एवं स्पाइन सर्जरी विभाग के सीनियर डायरेक्टर डॉ. दिनेश रतनानी ने बताया “इस बीमारी में दर्द अचानक शुरू हो सकता है और कुछ सेकंड से लेकर दो मिनट तक बना रह सकता है। मरीज इसे चुभने वाले, बिजली के झटके जैसे या तेज शूटिंग पेन के रूप में महसूस करते हैं। आमतौर पर दर्द चेहरे के एक तरफ होता है और होंठ, आंख, नाक, सिर की त्वचा, माथे या जबड़े जैसे हिस्सों को प्रभावित कर सकता है। कई बार रोजमर्रा की सामान्य गतिविधियां जैसे खाना खाना, बात करना, दांत साफ करना, चेहरे को छूना या ठंडी हवा के संपर्क में आना भी दर्द को ट्रिगर कर सकता है। ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया दो प्रकार का होता है—पहले प्रकार में तेज और अचानक दर्द होता है, जबकि दूसरे प्रकार में लंबे समय तक रहने वाला जलन, दर्द और धड़कन जैसा एहसास अधिक होता है।“


इस बीमारी की पहचान के लिए कोई एक विशेष टेस्ट उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर मरीज के लक्षणों, मेडिकल हिस्ट्री और चेहरे के दर्द से जुड़ी अन्य समस्याओं जैसे दांतों की बीमारी, टेम्पोरोमैंडिबुलर जॉइंट (TMJ) सिंड्रोम या क्लस्टर हेडेक को बाहर करके निदान करते हैं। MRI स्कैन के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि कहीं नर्व पर दबाव, मल्टीपल स्क्लेरोसिस या ट्यूमर जैसी समस्या तो नहीं है।


डॉ. दिनेश ने आगे बताया “इलाज की शुरुआत आमतौर पर दवाओं से की जाती है, विशेष रूप से ऐसी दवाओं से जो नर्व की गतिविधि को स्थिर करने में मदद करती हैं। कई मरीजों में ये दवाएं प्रभावी होती हैं, लेकिन समय के साथ इनके असर में कमी आ सकती है या चक्कर और थकान जैसे साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। यदि दवाएं असर न करें, तो सर्जरी एक विकल्प बनती है। माइक्रोवैस्कुलर डिकम्प्रेशन (MVD) सबसे प्रभावी प्रक्रियाओं में से एक मानी जाती है, जिसमें सर्जन नर्व और उस पर दबाव डालने वाली रक्त वाहिका के बीच सुरक्षात्मक परत लगाते हैं। इस प्रक्रिया की सफलता दर लगभग 80–90 प्रतिशत तक हो सकती है, हालांकि यह एक जटिल ब्रेन सर्जरी है। इसके अलावा, रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन (RF Ablation) जैसी प्रक्रियाओं का उपयोग भी दर्द की संवेदना कम करने के लिए किया जाता है।“


ट्राइजेमिनल न्यूराल्जिया के साथ जीवन जीना कई मरीजों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है क्योंकि अचानक होने वाले दर्द के दौरे चिंता, तनाव और अवसाद का कारण बन सकते हैं। ऐसे में दर्द को बढ़ाने वाले कारणों से बचना, जैसे बहुत ठंडी हवा से चेहरे की सुरक्षा करना, मुलायम भोजन लेना और डॉक्टरों या पेन स्पेशलिस्ट की सलाह लेना मददगार हो सकता है। यदि चेहरे में अचानक बिजली के झटके जैसा दर्द महसूस हो, तो इसे सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत विशेषज्ञ चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए।

May 06, 2026

Centre for Sight Introduces Advanced Pediatric Ophthalmology Services in Bhubaneswar

Centre for Sight Introduces Advanced Pediatric Ophthalmology Services in Bhubaneswar

Bhubaneswar, 06 May 2026: Strengthening its commitment to delivering specialised and comprehensive eye care, Centre for Sight Group of Eye Hospitals has introduced dedicated Pediatric Ophthalmology services at its Bhubaneswar centre, with the onboarding of Dr. Monalisa Mohapatra as Senior Consultant.


Because every child deserves to see their world clearly. With this addition, the centre enhances its capabilities in managing a wide range of childhood eye conditions, including squint (strabismus), pediatric cataract, and neuro-related vision disorders ensuring early diagnosis, timely intervention, and better visual outcomes for children.


Dr. Monalisa Mohapatra (MBBS, MS, FPOS) brings over 17 years of experience in ophthalmology and is an ex-consultant at the prestigious L V Prasad Eye Institute. She has extensive expertise in childhood eye care, squint correction, and complex visual disorders, with a strong focus on delivering precise, patient-friendly treatment. 


The Bhubaneswar centre offers comprehensive eye care services across cataract, retina, cornea, glaucoma, refractive procedures, and pediatric ophthalmology making it a one-stop destination for all eye problems. Backed by advanced diagnostics and modern surgical technologies, the focus remains on accuracy, safety, and improved patient outcomes.


Strategically located in Nayapalli, the centre ensures easy access to expert eye care for families across Bhubaneswar and nearby regions bringing specialised treatment closer to home. Backed by nearly three decades of clinical excellence, a network of 95+ centres and 350+ expert doctors, Centre for Sight continues to expand access to world-class eye care across India.


Don’t compromise on your vision. Trust the experts. Centre for Sight.

April 22, 2026

रोबोटिक सर्जरी से प्रोस्टेट कैंसर इलाज हुआ ज्यादा सुरक्षित और सटीक

रोबोटिक सर्जरी से प्रोस्टेट कैंसर इलाज हुआ ज्यादा सुरक्षित और सटीक

पटना: भारत में प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों को प्रभावित करने वाले शीर्ष दस कैंसरों में शामिल हो चुका है। वर्ष 2025 तक देश में 14 लाख से अधिक नए कैंसर मामलों का अनुमान हैऔर यह आंकड़ा किसी भी परिवार के लिए चिंता और डर पैदा कर सकता है जो डॉक्टर के सामने बैठा हो। लेकिन आज प्रोस्टेट कैंसर की कहानी सिर्फ डर तक सीमित नहीं रह गई है।

पिछले एक दशक में यह कहानी चुपचाप प्रिसिशनतेज रिकवरी और जल्दी घर लौटने की बन गई है। एक आम गलतफहमी यह है कि रोबोटिक सर्जरी में कंप्यूटर खुद ही इंसान के शरीर का ऑपरेशन करता हैजबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। 


मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलसाकेत के यूरोलॉजिकल ऑन्कोलॉजी और रोबोटिक सर्जरी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर डॉ. तुषार आदित्य नारायण ने बताया रोबोट दरअसल सर्जन के हाथों का ही एक एक्सटेंशन होता हैउससे ज्यादा कुछ नहीं। इसे ऐसे समझें जैसे सर्जन ने ऐसे ग्लव्स पहन रखे हों जो मानव कलाई से कहीं ज्यादा लचीलापन और मूवमेंट दे सकते हैं। डॉक्टर कुछ दूरी पर एक कंसोल पर बैठकर हर मूवमेंट को रियल टाइम में कंट्रोल करता है। जैसे ही सर्जन रुकता हैरोबोट भी रुक जाता है। इसमें न कोई ऑटोमैटिक निर्णय होता है और न ही कोई अंदाजा। करीब दस साल पहले प्रोस्टेट सर्जरी का मतलब होता था बड़ा चीराज्यादा ब्लड लॉस और अस्पताल में लगभग एक हफ्ते तक भर्ती रहना। आज वही सर्जरी बेहद छोटे छेदों के जरिए की जाती हैजो एक छोटे बटनहोल जितने होते हैं। शरीर जल्दी ठीक होता है क्योंकि उसे कम नुकसान पहुंचता है।“ 


इस बदलाव की असली पहचान चीरे के आकार से नहींबल्कि उन हिस्सों से है जिन्हें सर्जन सुरक्षित रख पाता है। प्रोस्टेट के आसपास बेहद नाजुक नर्व्स होती हैं जो ब्लैडर कंट्रोल और सेक्सुअल हेल्थ को प्रभावित करती हैं। पहले इन नर्व्स को बचाना लगभग असंभव थाऔर कई मरीज कैंसर से तो ठीक हो जाते थे लेकिन अपनी जीवन गुणवत्ता का एक अहम हिस्सा खो देते थे। 


डॉ. तुषार ने आगे बताया आज रोबोटिक सिस्टम सर्जन को थ्री-डायमेंशनल और मैग्निफाइड व्यू देता हैजिससे नर्व्स को सुरक्षित रखना न केवल संभव हुआ हैबल्कि ज्यादा सटीक और लगातार बेहतर तरीके से किया जा सकता है। खासकर 50 वर्ष के आसपास के मरीजों के लिए यह फर्क बहुत मायने रखता हैक्योंकि यह सिर्फ जीवन बचाने नहींबल्कि बेहतर जीवन जीने की संभावना देता है। अगर आप उन लोगों से बात करें जिन्होंने दस साल पहले प्रोस्टेट सर्जरी करवाई थीतो वे बताते हैं कि सामान्य जीवन में लौटने में कई हफ्ते लग जाते थे। आज ज्यादातर मरीज अगले ही दिन चलने लगते हैं और से दिन के भीतर घर वापस जा सकते हैं।“ 


प्रोस्टेट कैंसर का निदान आज भी गंभीर है और रहेगा। लेकिन आज उपलब्ध एडवांस्ड टेक्नोलॉजी के कारण यह गंभीरता अब विनाशकारी नहीं रह गई है। यदि आप या आपके परिवार में कोई इस स्थिति का सामना कर रहा हैतो किसी विशेषज्ञ से समय पर सलाह लेना सबसे महत्वपूर्ण कदम है। जितनी जल्दी यह बातचीत होगीउतने ज्यादा उपचार के विकल्प आपके सामने उपलब्ध रहेंगे।

April 20, 2026

फैटी लिवर को नजरअंदाज ना करें, समय रहते उठाएं सही कदम

फैटी लिवर को नजरअंदाज नहीं करें समय रहते उठाएं सही कदम

ग्वालियर: फैटी लिवर आजकल एक बहुत आम समस्या बन चुकी हैजो अक्सर किसी अन्य पेट की जांच के दौरान अल्ट्रासाउंड में अचानक सामने आती है। भारत में भी इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं और अनुमान है कि हर तीन में से एक व्यक्ति इस समस्या से प्रभावित हो सकता है। फैटी लिवर कई कारणों से हो सकता हैजिनमें शराब का सेवनमेटाबॉलिक डिसफंक्शन से जुड़ा फैटी लिवर (MASLD) और लिवर के वायरल संक्रमण जैसे हेपेटाइटिस बी और सी प्रमुख हैं। 


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलसाकेत के गैस्ट्रोएंटरोलॉजी विभाग के वाइस चेयरमैन एवं हेड डॉ. विकास सिंगला ने बताया आज फैटी लिवर केवल मोटापे तक सीमित बीमारी नहीं रह गई हैबल्कि यह एक साइलेंट हेल्थ थ्रेट बन चुकी है। इसके प्रमुख जोखिम कारकों में मेटाबॉलिक सिंड्रोम जैसे पेट के आसपास चर्बी बढ़नाटाइप डायबिटीजहाई ब्लड प्रेशर और खराब कोलेस्ट्रॉल प्रोफाइल शामिल हैं। इसके अलावा खराब लाइफस्टाइलजैसे कम शारीरिक गतिविधिज्यादा कैलोरी वाला भोजनप्रोसेस्ड और ऑयली फूड का अधिक सेवनसाथ ही रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट और शुगर युक्त ड्रिंक्स का ज्यादा उपयोग भी इस समस्या को बढ़ाते हैं। उम्र बढ़ने के साथ इसका खतरा बढ़ता है और पुरुषों में यह अधिक देखा जाता हैजबकि परिवार में डायबिटीज या मोटापे का इतिहास भी जोखिम को बढ़ा सकता है। 


अगर अल्ट्रासाउंड में फैटी लिवर का पता चलता हैतो घबराने की जरूरत नहीं हैलेकिन इसे नजरअंदाज करना भी गलत है। शुरुआती अवस्था में यह पूरी तरह ठीक हो सकता हैलेकिन समय रहते ध्यान न देने पर यह लिवर में सूजनफाइब्रोसिससिरोसिस और कुछ मामलों में लिवर कैंसर तक बढ़ सकता है। साथ ही यह डायबिटीजहृदय रोग और स्ट्रोक जैसी बीमारियों का खतरा भी बढ़ाता है। इसलिए जरूरी है कि मरीज किसी विशेषज्ञजैसे हेपेटोलॉजिस्ट से सलाह लेंजो ब्लड टेस्ट और फाइब्रोस्कैन जैसे सरल टेस्ट के जरिए बीमारी की सही स्थिति का आकलन कर सकते हैं। 


डॉ. विकास ने आगे बताया फैटी लिवर में सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि लिवर में फैट है या नहींबल्कि यह है कि क्या उसमें स्कारिंग (फाइब्रोसिस) शुरू हो गई है। फाइब्रोस्कैन एक आसान और नॉन-इनवेसिव टेस्ट हैजिससे लिवर में फैट और फाइब्रोसिस की मात्रा का पता लगाया जा सकता है। शुरुआती अवस्था में सही इलाज और देखभाल से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। इसके इलाज की बुनियाद बहुत सरल लेकिन प्रभावी है—वजन कम करनाखासकर पेट की चर्बी घटानानियमित व्यायाम करना और मेटाबॉलिक जोखिम कारकों को नियंत्रित करना। सिर्फ 5% वजन कम करने से लिवर में फैट घट सकता है, 7% तक वजन कम करने से सूजन में सुधार आता है और 10% या उससे अधिक वजन कम करने से कुछ मामलों में फाइब्रोसिस भी रिवर्स हो सकता है। जिन मरीजों में केवल लाइफस्टाइल बदलाव से सुधार नहीं होताउनके लिए नई दवाओं के विकल्प भी उपलब्ध हैं।“ 


भारत में फैटी लिवर को लेकर सोच बदलने की जरूरत है। यह कोई छोटी समस्या नहींबल्कि शरीर का एक शुरुआती चेतावनी संकेत है। बेहतर खान-पान अपनाएंनियमित रूप से सक्रिय रहेंपेट की चर्बी कम करेंपर्याप्त नींद लेंशराब का सेवन सीमित करें और समय-समय पर डायबिटीज व कोलेस्ट्रॉल की जांच कराएं। यदि आपकी रिपोर्ट में फैटी लिवर आया हैतो डरने की नहींबल्कि तुरंत सही कदम उठाने की जरूरत है और विशेषज्ञ से सलाह लेना सबसे पहला कदम होना चाहिए।

March 24, 2026

ओवेरियन कैंसर को लेकर फैली गलतफहमियां क्यों हैं खतरनाक

ओवेरियन कैंसर को लेकर फैली गलतफहमियां क्यों हैं खतरनाक

 

पानीपत: महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी कई बीमारियों में ओवेरियन कैंसर ऐसी स्थिति है जिसके बारे में लोगों में काफी गलतफहमियां मौजूद हैं। इसे अक्सर “साइलेंट” या “हिडन” कैंसर भी कहा जाता हैक्योंकि इसके लक्षण शुरुआती चरण में स्पष्ट नहीं होते और कई बार सामान्य समस्याओं जैसे पाचन संबंधी दिक्कत या पीरियड्स से जुड़ी परेशानियों से मिलते-जुलते होते हैं। यही कारण है कि इसके कारणलक्षण और जोखिम से जुड़ी गलत जानकारी कई बार समय पर पहचान और इलाज में देरी कर देती है। यदि महिलाएं इसके बारे में सही जानकारी रखें और शरीर में होने वाले बदलावों को समझेंतो वे समय रहते डॉक्टर से सलाह लेकर अपनी सेहत की बेहतर देखभाल कर सकती हैं। 


ओवेरियन कैंसर को लेकर कई मिथक इसलिए भी बने रहते हैं क्योंकि इसे अक्सर अन्य गाइनकोलॉजिकल समस्याओं जैसे ओवेरियन सिस्ट या एंडोमेट्रियोसिस के साथ भ्रमित कर दिया जाता है। साथ ही इसके शुरुआती लक्षण बहुत हल्के या अस्पष्ट हो सकते हैंजिससे कई बार उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। जागरूकता की कमी और इस विषय पर खुलकर चर्चा न होने से भी गलत धारणाएं फैलती रहती हैं। सही जानकारी मिलने पर महिलाएं अपने स्वास्थ्य से जुड़े फैसले अधिक समझदारी से ले सकती हैं और जरूरत पड़ने पर समय पर जांच और उपचार करा सकती हैं। 


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलद्वारका के गाइनी सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की सीनियर कंसल्टेंट एवं यूनिट हेड डॉ. सरिता कुमारी ने बताया सबसे आम मिथकों में से एक यह है कि ओवेरियन कैंसर केवल अधिक उम्र या मेनोपॉज के बाद की महिलाओं में ही होता है। हालांकि यह सच है कि उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम बढ़ सकता हैलेकिन यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती हैयहां तक कि प्रजनन आयु की महिलाओं और किशोरियों में भी। ओवेरियन कैंसर के अलग-अलग प्रकार होते हैं जो अलग-अलग उम्र में दिखाई दे सकते हैं। इसलिए हर उम्र की महिलाओं के लिए अपने गाइनकोलॉजिकल स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना और नियमित चेक-अप कराना जरूरी है। एक और आम गलतफहमी यह है कि ओवेरियन कैंसर के लक्षण शुरुआत से ही स्पष्ट और गंभीर होते हैं। वास्तव में इसके शुरुआती संकेत अक्सर बहुत हल्के होते हैंजैसे लगातार पेट फूलनापेट या पेल्विक क्षेत्र में असहजताबार-बार पेशाब आना या भूख में बदलाव। चूंकि ये लक्षण कई सामान्य समस्याओं से मिलते-जुलते होते हैंइसलिए महिलाएं अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देती हैं। फर्क यह है कि ओवेरियन कैंसर से जुड़े लक्षण समय के साथ लगातार बने रहते हैं और धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं। यदि ऐसे बदलाव लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है। 


कई लोगों को यह भी लगता है कि ओवेरियन सिस्ट होने का मतलब कैंसर होना हैजबकि ऐसा नहीं है। अधिकतर सिस्ट सौम्य यानी गैर-कैंसरस होते हैं और अक्सर बिना किसी इलाज के अपने-आप ठीक हो जाते हैं। ये महिलाओं के सामान्य हार्मोनल चक्र का हिस्सा भी हो सकते हैं। हालांकि यदि कोई सिस्ट बहुत बड़ा होलंबे समय तक बना रहे या उसमें कुछ असामान्य संरचना दिखाई देतो डॉक्टर अतिरिक्त जांच की सलाह दे सकते हैं। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई गंभीर समस्या न हो। 


डॉ. सरिता ने आगे बताया “यह धारणा भी गलत है कि ओवेरियन कैंसर को बहुत देर होने तक पहचाना ही नहीं जा सकता। आज के समय में डॉक्टरों के पास कई आधुनिक जांच तकनीकें उपलब्ध हैं जिनकी मदद से ओवरी से जुड़ी असामान्यताओं का पता लगाया जा सकता है। इनमें पेल्विक एग्जामिनेशनअल्ट्रासाउंडब्लड टेस्ट जैसे CA-125 ट्यूमर मार्कर की जांचतथा आवश्यकता पड़ने पर सीटी स्कैन या एमआरआई शामिल हैं। नियमित गाइनकोलॉजिकल चेक-अप और शरीर के संकेतों के प्रति सजग रहने से संभावित समस्या का पता शुरुआती चरण में लग सकता हैजिससे उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है। एक और आम मिथक यह है कि ओवेरियन कैंसर केवल उन्हीं महिलाओं को होता है जिनके परिवार में पहले से इसका इतिहास हो। जबकि पारिवारिक इतिहास एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक हो सकता हैलेकिन यह अकेला कारण नहीं है। उम्र बढ़नाएंडोमेट्रियोसिसकुछ हार्मोनल कारकलंबे समय तक हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपीतथा जीवनशैली से जुड़े पहलू जैसे असंतुलित आहारशारीरिक गतिविधि की कमी और धूम्रपान भी जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। परिवार में किसी को यह बीमारी होने का मतलब यह नहीं है कि हर महिला को यह जरूर होगालेकिन ऐसे मामलों में नियमित स्क्रीनिंग और डॉक्टर की सलाह लेना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।“ 


अंततः ओवेरियन कैंसर से बचाव और समय पर पहचान की सबसे बड़ी कुंजी जागरूकता है। यदि महिलाएं अपने शरीर में होने वाले लगातार बदलावों को समझें और उन्हें नजरअंदाज न करेंतो बीमारी का पता जल्दी लग सकता है। पेल्विक दर्दलगातार पेट फूलनाभूख में बदलाव या अन्य असामान्य लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। नियमित जांच और विशेषज्ञ से खुलकर बातचीत महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने में मदद कर सकती है।

February 24, 2026

भारत में किडनी ट्रांसप्लांट को नई दिशा दे रही रोबोटिक सर्जरी

भारत में किडनी ट्रांसप्लांट को नई दिशा दे रही रोबोटिक सर्जरी

लखनऊ: किडनी ट्रांसप्लांट एंड-स्टेज रीनल डिजीज से पीड़ित मरीजों के लिए गोल्ड स्टैंडर्ड उपचार माना जाता है। परंपरागत रूप से ओपन सर्जरी लंबे समय से सफलतापूर्वक की जाती रही है और आज भी कई केंद्रों पर प्रचलित है। हालांकिओपन सर्जरी के साथ कई चुनौतियाँ जुड़ी होती हैंजैसे सर्जरी के बाद अधिक दर्दरिकवरी में अधिक समयकॉस्मेटिक परिणामों में कमीघाव में संक्रमण का खतराविशेषकर डायबिटीज और मोटापे से ग्रस्त मरीजों में।

 

मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलसाकेत के यूरोलॉजीरीनल ट्रांसप्लांट एवं रोबोटिक्सयूरो-ऑन्कोलॉजी विभाग के चेयरमैन डॉ. अनंत कुमार ने बताया “इन समस्याओं को कम करने के लिए हाल के वर्षों में रोबोटिक प्लेटफॉर्म पर आधारित मिनिमली इनवेसिव सर्जरी तकनीक दुनिया भर में तेजी से स्थापित हो रही है। हम देश के उन चुनिंदा केंद्रों में से हैं जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों में इस तकनीक को अपनाया हैताकि वैश्विक मानकों के अनुरूप मरीजों को अत्याधुनिक उपचार उपलब्ध कराया जा सके। रोबोटिक तकनीक सर्जन को बेहतर 3D विज़न प्रदान करती है और छोटी चीरा (इंसिजन) के माध्यम से सर्जरी करने की सुविधा देती है। इसका परिणाम यह होता है कि मरीजों को कम दर्द होता है और वे तेजी से स्वस्थ होकर सामान्य जीवन में लौट पाते हैं। रोबोटिक ट्रांसप्लांट में लिंफ फ्लूड के जमा होने (लिंफोसील) की संभावना भी लगभग नगण्य होती है।

 

डॉ. अनंत ने आगे बताया “हालांकि रोबोटिक ट्रांसप्लांट में ऑपरेशन का समय ओपन सर्जरी की तुलना में थोड़ा अधिक हो सकता हैलेकिन इसके लाभ संभावित जोखिमों से कहीं अधिक हैं। अस्पताल में रहने की अवधि लगभग ओपन ट्रांसप्लांट के समान ही रहती है। अधिकांश मामलों में किडनी का कार्य तुरंत शुरू हो जाता है और पेशाब की मात्रा अच्छी रहती है। हमारे कुछ मरीजों में छाती का संक्रमण और एक मरीज में किडनी रिजेक्शन देखा गयाजो रोबोटिक तकनीक से संबंधित नहीं थे और ओपन सर्जरी में भी हो सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी मरीज में जानलेवा जटिलता नहीं देखी गई और अधिकांश मरीज अगले ही दिन चलने-फिरने लगे तथा सामान्य आहार लेने लगे। कम दर्द के कारण वे जल्दी ही अपनी दिनचर्या में लौट आए। कॉस्मेटिक परिणाम ओपन सर्जरी की तुलना में कहीं बेहतर और लगभग अतुलनीय हैं।

 

रोबोटिक सर्जरी की प्रमुख सीमा इसकी लागत हैक्योंकि यह ओपन ट्रांसप्लांट की तुलना में अधिक महंगी होती है। फिर भीविशेषकर मोटापे से ग्रस्त मरीजों में जहां घाव से जुड़ी जटिलताएँ लगभग सामान्य होती हैंरोबोटिक सर्जरी एक बड़ी राहत साबित हो रही है। मैक्स में हम नियमित रूप से इस प्रकार की रोबोटिक किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी कर रहे हैं और मरीजों को सुरक्षित आधुनिक उपचार उपलब्ध करा रहे हैं।