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January 30, 2026

जीपीएस जैसी न्यूरो-नेविगेशन तकनीक से ब्रेन ट्यूमर सर्जरी में आई नई सटीकता

जीपीएस जैसी न्यूरो-नेविगेशन तकनीक से ब्रेन ट्यूमर सर्जरी में आई नई सटीकता

हल्दवानी: जब भी ब्रेन सर्जरी की बात आती हैतो अधिकतर लोगों के मन में यह धारणा होती है कि यह बेहद जोखिम भरी प्रक्रिया हैजिसमें स्वस्थ ब्रेन टिश्यू को नुकसान पहुँचने की आशंका रहती है। हालांकिब्रेन ट्यूमर की सर्जरी आज भी मेडिकल साइंस की सबसे नाज़ुक सर्जरी में गिनी जाती हैलेकिन नई टेक्नोलॉजी ने इसे पहले से कहीं ज़्यादा सुरक्षित और सटीक बना दिया है। ऐसी ही एक आधुनिक तकनीक है न्यूरो-नेविगेशनजिसे अक्सर ब्रेन के लिए जीपीएस कहा जाता है। 


न्यूरो-नेविगेशन एक कंप्यूटर-असिस्टेड टेक्नोलॉजी हैजो सर्जरी के दौरान सर्जन को ब्रेन के भीतर सही दिशा और रास्ता दिखाती है। जैसे कार में लगा जीपीएस ड्राइवर को सबसे सुरक्षित और छोटा रास्ता बताता हैवैसे ही न्यूरो-नेविगेशन न्यूरोसर्जन को ब्रेन ट्यूमर तक पहुँचने के लिए सबसे सटीक और सुरक्षित सर्जिकल पाथ प्लान करने में मदद करता है। 


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलवैशाली के न्यूरोसर्जरी (ब्रेन एंड स्पाइनविभाग के एसोसिएट डायरेक्टरडॉ. ऋषिकेश चक्रवर्ती ने बताया“MRI या CT इमेजिंग की मदद से न्यूरो-नेविगेशन मरीज के ब्रेन का एक डिटेल्ड थ्री-डायमेंशनल मैप तैयार करता हैजो सर्जरी के दौरान रियल-टाइम में सर्जन को गाइड करता है। इससे किसी भी चीरा लगाने से पहले ट्यूमर की सटीक लोकेशन का पता चल जाता हैहेल्दी ब्रेन टिश्यू को कम से कम प्रभावित करते हुए सबसे सुरक्षित रास्ता चुना जा सकता है और पूरी सर्जरी के दौरान इंस्ट्रूमेंट्स की मूवमेंट पर लगातार नज़र रखी जा सकती है।” 


एक गाइड की तरह काम करते हुए न्यूरो-नेविगेशन अनुमान पर निर्भरता को काफी हद तक कम कर देता है। सर्जन साफ-साफ देख सकता है कि ट्यूमर कहाँ से शुरू होता है और कहाँ खत्म होता हैसाथ ही उसके आसपास मौजूद ब्लड वेसल्स और सेंसिटिव ब्रेन एरियाज़ भी दिखाई देते हैं। इससे सर्जरी के बाद बोलने में दिक्कतकमजोरी या दृष्टि हानि जैसी जटिलताओं का रिस्क कम हो जाता है। इसके अलावाट्यूमर को पूरी तरह निकालने की संभावना भी बढ़ती हैजो रिक्रेन्स को रोकने और लॉन्ग-टर्म सर्वाइवल के लिए बेहद ज़रूरी है। 


डॉ. ऋषिकेश ने आगे कहा, “न्यूरो-नेविगेशन हेल्दी ब्रेन टिश्यू को होने वाले नुकसान के खतरे को काफी कम कर देता हैजिससे ब्रेन ट्यूमर सर्जरी अधिक सुरक्षित और कंट्रोल्ड बनती है। बेहतर सर्जिकल प्रिसिशन के कारण ऑपरेशन का समय कम होता हैब्लड लॉस घटता हैरिकवरी तेज़ होती है और न्यूरोलॉजिकल फंक्शन बेहतर तरीके से सुरक्षित रहता है। यह तकनीक खासतौर पर उन मरीजों के लिए बहुत उपयोगी हैजिनका ट्यूमर ब्रेन के गहरे हिस्सों में या उन एरियाज़ के पास होता है जो महत्वपूर्ण फंक्शंस को कंट्रोल करते हैं। हालांकि हर केस में इसकी ज़रूरत नहीं होतीलेकिन कई मरीजों के लिए यह इलाज को ज़्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद बनाती है।” 


कुल मिलाकरन्यूरो-नेविगेशन न्यूरोसर्जरी के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव लेकर आई है। ब्रेन के लिए जीपीएस की तरह काम करते हुए यह सर्जन को सही प्लानिंगक्रिटिकल स्ट्रक्चर्स से बचाव और ट्यूमर तक बेहद सटीक पहुँच बनाने में मदद करती है। मरीजों के लिए इसका मतलब है अधिक सुरक्षित सर्जरीबेहतर रिकवरी और जीवन की गुणवत्ता में सुधार।

January 28, 2026

सेंटर फॉर साइट ने मोहाली में अत्याधुनिक आई हॉस्पिटल की शुरुआत के साथ पंजाब में अपनी मौजूदगी का विस्तार किया

सेंटर फॉर साइट ने मोहाली में अत्याधुनिक आई हॉस्पिटल की शुरुआत के साथ पंजाब में अपनी मौजूदगी का विस्तार किया

मोहाली : भारत के सबसे भरोसेमंद सुपर-स्पेशलिटी आई केयर नेटवर्क्स में से एक, सेंटर फॉर साइट ने मोहाली में अपने अत्याधुनिक ​आई हॉस्पिटल की शुरुआत की है। इस नए सेंटर के शुरू होने से मोहाली, चंडीगढ़, पंचकुला और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को अब वर्ल्ड-क्लास ​आई केयर अपने घर के पास ही उपलब्ध होगा, जिससे विशेष इलाज के लिए महानगरों की यात्रा की आवश्यकता नहीं रहेगी। 

 

उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पंजाब सरकार के इंडस्ट्री एवं कॉमर्स, इन्वेस्टमेंट प्रमोशन और पावर मंत्री श्री संजीव अरोड़ा उपस्थित रहे। उनके साथ सम्मानित अतिथियों के रूप में पंजाब सरकार के एनिमल हसबैंड्री, डेयरी डेवलपमेंट एवं फिशरीज विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेटरी, श्री राहुल भंडारी (आईएएस) तथा फूड प्रोसेसिंग विभाग की प्रिंसिपल सेक्रेटरी श्रीमतीराखी गुप्ता भंडारी (आईएएस), मौजूद रहीं।

 

इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री संजीव अरोड़ा ने कहा कि “मोहाली जैसे शहरी केंद्र तेजी से विकसित हो रहे हैं और इस विकास के साथ एडवांस्ड हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता भी बढ़ रही है। वर्ल्ड-क्लास आई केयर फैसिलिटी की स्थापना से शुरुआती डायग्नोसिस बेहतर होगा, इलाज की पहुंच बढ़ेगी और पूरे पंजाब में मरीजों को लंबे समय तक बेहतर विज़न आउटकम्स मिल सकेंगे।“

 

नए मोहाली सेंटर में एक ही छत के नीचे व्यापक नेत्र सेवाएं उपलब्ध हैं, जिन्हें कटिंग-एज टेक्नोलॉजी और अनुभवी ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट्स की टीम का समर्थन प्राप्त है। यहां माइक्रो-इंसिजन फेकोइमल्सिफिकेशन तकनीक से एडवांस्ड कैटरैक्ट सर्जरी की जाती है, साथ ही ट्राइफोकल, मल्टीफोकल, टॉरिक और EDOF जैसे प्रीमियम इंट्राओक्यूलर लेंस विकल्प भी उपलब्ध हैं। इसके अलावा ग्लूकोमा, रेटिना व विट्रियो-रेटिनल डिज़ऑर्डर्स, कॉर्निया से जुड़ी समस्याएं जैसे केराटोकोनस, स्क्विंट और पीडियाट्रिक ऑप्थैल्मोलॉजी की विशेष सेवाएं भी यहां प्रदान की जाती हैं।

 

लॉन्च के दौरान सेंटर फॉर साइट ग्रुप ऑफ आई हॉस्पिटल्स के चेयरमैन एवं मेडिकल डायरेक्टर, प्रो. डॉ. महिपाल एस. सचदेव ने कहा कि “भारत में विज़ुअल इम्पेयरमेंट अब भी एक बड़ी पब्लिक हेल्थ चुनौती है। सेंटर फॉर साइट में हमेशा क्लिनिकल एक्सपर्टीज़ को लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के साथ जोड़कर हाई-क्वालिटी और प्रेडिक्टेबल रिज़ल्ट्स देने पर जोर दिया गया है। मोहाली सेंटर की शुरुआत इसी प्रतिबद्धता का प्रतीक है, ताकि एडवांस्ड आई केयर उन समुदायों तक पहुंच सके जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है। समय पर जांच, प्रिवेंटिव आई केयर और सही समय पर इंटरवेंशन विज़न को बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।“

 

मोहाली फैसिलिटी की एक प्रमुख खासियत यहां उपलब्ध एडवांस्ड रिफ्रैक्टिव सर्जरी सॉल्यूशंस हैं, जिनमें नेक्स्ट-जेनरेशन LASIK टेक्नोलॉजी शामिल है। इसके जरिए मरीज सुरक्षित, सटीक और पर्सनलाइज़्ड प्रोसीजर्स के माध्यम से चश्मा-मुक्त दृष्टि प्राप्त कर सकते हैं। मरीजों को सहज अनुभव देने के लिए अस्पताल में आधुनिक कंसल्टेशन रूम्स, एडवांस्ड डायग्नोस्टिक सिस्टम्स और प्रिसिशन सर्जिकल सूट्स बनाए गए हैं, जो हर चरण में सुरक्षा, आराम और क्लिनिकल एक्सीलेंस सुनिश्चित करते हैं।

 

लगभग तीन दशकों के अनुभव, देशभर में 90 से अधिक सेंटर्स और 350 से ज्यादा विशेषज्ञ ऑप्थैल्मोलॉजिस्ट्स की टीम के साथ सेंटर फॉर साइट लगातार अपने नेटवर्क का विस्तार कर रहा है। यह लॉन्च टेक्नोलॉजी-ड्रिवन, हाई-क्वालिटी और एथिकल आई केयर को सभी तक पहुंचाने के मिशन की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है।

 

पद्मश्री सम्मानित डॉ. महिपाल सिंह सचदेव द्वारा स्थापित सेंटर फॉर साइट आज 33 शहरों में फैले 90 से अधिक सेंटर्स का मजबूत राष्ट्रीय नेटवर्क संचालित करता है। संस्थान भारतीय ऑप्थैल्मोलॉजी में कई महत्वपूर्ण इनोवेशन्स का अगुवा रहा है, जिसमें भारत में पहली बार SMILE टेक्नोलॉजी की शुरुआत, SILK तकनीक का सह-विकास और एआई-पावर्ड FORESIGHT टेक्नोलॉजी के साथ एशिया का पहला SCHWIND AMARIS 1050RS LASIK लेज़र लॉन्च करना शामिल है। हर साल 15 लाख से अधिक मरीजों का उपचार करने वाला सेंटर फॉर साइट क्लिनिकल एक्सीलेंस, इनोवेशन और पेशेंट-सेंट्रिक आई केयर में लगातार नए बेंचमार्क स्थापित कर रहा है, क्योंकि विज़न के मामले में कोई समझौता नहीं होना चाहिए।

January 23, 2026

एडवांस्ड हार्ट फेलियर मरीजों के लिए LVAD बना भरोसेमंद समाधान

एडवांस्ड हार्ट फेलियर मरीजों के लिए LVAD बना भरोसेमंद समाधान

वाराणसी: हार्ट फेलियर एक ऐसी स्थिति है जिसमें हृदय की मांसपेशियां शरीर में पर्याप्त मात्रा में खून पंप नहीं कर पातीं। यह समस्या अक्सर हाई ब्लड प्रेशरनसों के सिकुड़ने या अन्य हृदय रोगों के कारण होती हैजिससे दिल कमजोर या सख्त हो जाता है। इसके चलते मरीज को लगातार थकानसांस फूलना और शरीर में सूजन जैसे लक्षण महसूस होते हैं। हार्ट फेलियर एक प्रोग्रेसिव कंडीशन हैजिसके लिए समय पर और सही इलाज बेहद जरूरी होता है ताकि मरीज की जीवन गुणवत्ता बेहतर बनी रहे। 


क्रॉनिक और एडवांस्ड हार्ट फेलियर के मामलों में हार्ट ट्रांसप्लांट या लेफ्ट वेंट्रिकुलर असिस्ट डिवाइस (LVAD) प्रभावी इलाज के विकल्प माने जाते हैं। मेडिकल साइंस और टेक्नोलॉजी में हुई प्रगति के कारण अब उन मरीजों के लिए भी समाधान उपलब्ध हैंजिनमें दवाइयोंलाइफस्टाइल बदलाव या सर्जरी से पर्याप्त फायदा नहीं मिल पाता। ऐसे मामलों में LVAD एक सुरक्षित और व्यावहारिक विकल्प के रूप में सामने आया हैखासतौर पर तब जब हार्ट ट्रांसप्लांट संभव न हो। 


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलसाकेत के सीटीवीएस विभाग के चेयरमैन एवं हेड डॉ. रजनीश मल्होत्रा ने बताया “करीब 90 प्रतिशत हार्ट फेलियर मरीजों में लेफ्ट वेंट्रिकल प्रभावित होता हैक्योंकि दिल की 70–80 प्रतिशत मांसपेशियां इसी हिस्से में होती हैं। LVAD एक बैटरी से चलने वाला मैकेनिकल पंप हैजिसे ओपन हार्ट सर्जरी के जरिए दिल में लगाया जाता है। यह कमजोर लेफ्ट वेंट्रिकल की मदद करते हुए शरीर में खून का नियमित प्रवाह बनाए रखता है। यह उन मरीजों के लिए भी एक विकल्प है जो किसी कारणवश हार्ट ट्रांसप्लांट के योग्य नहीं होते। हालांकिब्लड क्लॉटिंग की समस्याकिडनी फेलियरलिवर या लंग डिजीज और गंभीर इंफेक्शन जैसी स्थितियों में LVAD से पहले विस्तृत मेडिकल इवैल्यूएशन जरूरी होता है। 


LVAD को आज ‘डेस्टिनेशन थैरेपी’ के रूप में भी देखा जा रहा हैखासकर उन मरीजों के लिए जिनमें हार्ट ट्रांसप्लांट संभव नहीं है। यह डिवाइस लेफ्ट वेंट्रिकल में लगाया जाता है और एक ट्यूब के जरिए एओर्टा से जुड़ा होता हैजिससे खून पूरे शरीर में आसानी से पहुंचता है। इससे हार्ट फेलियर के लक्षणों में कमी आती है और मरीज की ओवरऑल क्वालिटी ऑफ लाइफ में सुधार होता है। 


डॉ. रजनीश ने आगे बताया “LVAD थेरेपी से मरीजों को कई फायदे मिलते हैं। इससे थकान और सांस फूलने जैसे लक्षण कम होते हैंजिससे वे रोजमर्रा की गतिविधियां ज्यादा सहजता से कर पाते हैं। बेहतर ब्लड फ्लो के कारण किडनीलिवरब्रेन और अन्य अंगों की कार्यक्षमता भी सुधरती है। जो मरीज हार्ट ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे होते हैंउनके लिए LVAD ‘ब्रिज टू ट्रांसप्लांट’ की तरह काम करता हैजबकि कुछ मामलों में इसे लंबे समय के समाधान यानी डेस्टिनेशन थैरेपी के तौर पर भी लगाया जाता हैजिससे जीवन अवधि और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है। 


हालांकि, LVAD के साथ जीवन जीने के लिए कुछ सावधानियां बेहद जरूरी हैं। मरीज को डॉक्टर की सभी मेडिकल सलाह का सख्ती से पालन करना चाहिए और नियमित रूप से ब्लड प्रेशरहार्ट रेट और वजन की निगरानी करनी चाहिए। डिवाइस की बैटरी और कंट्रोलर का सही तरीके से मैनेजमेंट जरूरी होता है। इसके साथ ही हेल्दी डाइटरेगुलर एक्सरसाइजस्ट्रेस मैनेजमेंट और पर्याप्त नींद जैसी लाइफस्टाइल आदतें इलाज की सफलता में अहम भूमिका निभाती हैं। इलाज के बाद भी नियमित फॉलो-अप और किसी भी असामान्य लक्षण पर तुरंत ध्यान देना आवश्यक है। 


भले ही LVAD के साथ कुछ चुनौतियां जुड़ी होंलेकिन आधुनिक टेक्नोलॉजी ने इसे हार्ट फेलियर मरीजों के लिए एक भरोसेमंद और प्रभावी विकल्प बना दिया है। चाहे यह हार्ट ट्रांसप्लांट तक पहुंचने का एक जरिया हो या लंबे समय का समाधान, LVAD ने हार्ट फेलियर के इलाज में एक नई उम्मीद और नया युग शुरू किया है।

January 13, 2026

लंबे समय तक लगातार सिरदर्द हो सकता है ब्रेन ट्यूमर का संकेत ‌‌!

लंबे समय तक लगातार सिरदर्द हो सकता है ब्रेन ट्यूमर का संकेत ‌‌!

आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम के न्यूरोसर्जरी एंड साइबरनाइफ विभाग के डायरेक्टर डॉ. आदित्य गुप्ता ने एक पब्लिक अवेयरनेस सेशन में लोगों को सतर्क किया कि लगातार रहने वाला सिरदर्द कभी-कभी ब्रेन ट्यूमर जैसी गंभीर समस्या का संकेत भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि सिरदर्द एक बहुत आम शिकायत है, लेकिन अगर यह दवाओं से ठीक न हो, सुबह के समय ज्यादा तेज हो, धीरे-धीरे बढ़ता जाए या इसके साथ उल्टी, धुंधला दिखना, दौरे पड़ना, हाथ-पैरों में कमजोरी, संतुलन बिगड़ना या बोलने-व्यवहार में बदलाव जैसे लक्षण दिखें, तो तुरंत विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।

सिरदर्द के चेतावनी संकेत – डॉ. आदित्य गुप्ता की सलाह

डॉ. आदित्य गुप्ता ने बताया कि ज्यादातर सिरदर्द स्ट्रेस, डिहाइड्रेशन, आंखों पर जोर, साइनस या माइग्रेन के कारण होते हैं। लेकिन कुछ सिरदर्द चिंता का कारण बन सकते हैं। उन्होंने कहा, “समय पर जांच बेहद अहम होती है। अगर पर्याप्त दवा या लाइफस्टाइल में बदलाव के बावजूद सिरदर्द बना रहता है, तो डिटेल्ड क्लिनिकल असेसमेंट कराना चाहिए। इसकी शुरुआत न्यूरोलॉजिकल 

 एग्जामिनेशन से होती है, जिसके बाद MRI या CT स्कैन जैसी ब्रेन इमेजिंग जांच की जाती है। इनसे ब्रेन में किसी असामान्य ग्रोथ, प्रेशर या स्ट्रक्चरल समस्या का पता चलता है।”

डॉ. गुप्ता ने जोर दिया कि ब्रेन ट्यूमर किसी भी उम्र के व्यक्ति को हो सकता है और शुरुआत में इसके लक्षण बहुत हल्के हो सकते हैं। चेतावनी संकेतों को नजरअंदाज करना या जांच में देरी करना बीमारी को आगे बढ़ने का मौका देता है, जिससे इलाज ज्यादा जटिल हो जाता है।

साइबरनाइफ रेडियोसर्जरी की बढ़ती भूमिका

डॉ. आदित्य गुप्ता ने बताया कि साइबरनाइफ एक बेहद एडवांस, नॉन-इनवेसिव रेडिएशन टेक्नोलॉजी है, जो बिना ओपन सर्जरी के ट्यूमर पर हाई-डोज और पिनपॉइंट एक्यूरेट रेडिएशन देती है। यह खास तौर पर उन ट्यूमर के लिए फायदेमंद है जो ब्रेन के गहरे हिस्सों में या महत्वपूर्ण स्ट्रक्चर्स के पास होते हैं। इलाज पूरी तरह दर्दरहित है, इसमें न चीरा लगता है और न ही एनेस्थीसिया की जरूरत होती है। मरीज जल्दी अपनी सामान्य दिनचर्या में लौट सकता है।

नेविगेशन-गाइडेड और एंडोस्कोपिक न्यूरोसर्जरी पर भी प्रकाश

डॉ. गुप्ता ने नेविगेशन-गाइडेड न्यूरोसर्जरी और एंडोस्कोपिक न्यूरोसर्जरी की भूमिका पर भी बात की। नेविगेशन-गाइडेड सर्जरी में रियल-टाइम इमेजिंग और कंप्यूटर-असिस्टेड गाइडेंस से ट्यूमर को सटीक तरीके से निकाला जाता है, जिससे आसपास के महत्वपूर्ण ब्रेन स्ट्रक्चर्स सुरक्षित रहते हैं। एंडोस्कोपिक न्यूरोसर्जरी छोटे चीरे या ट्रांस नेजल रूट से की जाती है, जो गहराई में स्थित ट्यूमर तक कम टिशू डैमेज के साथ पहुंचने में मदद करती है। ये मिनिमली इनवेसिव तकनीकें सर्जिकल ट्रॉमा, ब्लड लॉस, हॉस्पिटल स्टे और रिकवरी टाइम को काफी कम करती हैं।

डॉक्टरों की अपील: लक्षणों को गंभीरता से लें

सेशन के अंत में डॉक्टरों ने लोगों से अपील की कि वे अपने शरीर के संकेतों को गंभीरता से लें, लंबे समय तक रहने वाले लक्षणों में सेल्फ-मेडिकेशन से बचें और सिरदर्द अगर लगातार या असामान्य हो जाए तो विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह जरूर लें। आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम ने कम्युनिटी एजुकेशन, अर्ली डायग्नोसिस और एडवांस टेक्नोलॉजी के जरिए बेहतर न्यूरोलॉजिकल केयर और मरीजों के बेहतर नतीजों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई।

प्रमुख चेतावनी संकेत एक नजर में

लक्षणसंभावित गंभीर समस्या
लगातार सिरदर्द जो दवाओं से ठीक न होब्रेन ट्यूमर या अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्या
सुबह के समय ज्यादा तेज सिरदर्दइंट्राक्रेनियल प्रेशर बढ़ना
सिरदर्द के साथ उल्टीब्रेन में दबाव या ट्यूमर
धुंधला दिखना, दौरे, कमजोरीएन्सेफलाइटिस या ट्यूमर का असर
संतुलन बिगड़ना, बोलने में बदलावगंभीर ब्रेन समस्या

निष्कर्ष: समय पर जांच से बच सकती है जान

डॉ. आदित्य गुप्ता का यह सेशन लोगों को सिरदर्द को हल्के में न लेने की महत्वपूर्ण सीख देता है। ब्रेन ट्यूमर या अन्य गंभीर समस्याओं में शुरुआती जांच और इलाज से रिकवरी की संभावना बहुत अधिक होती है। अगर सिरदर्द असामान्य या लगातार हो, तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से संपर्क करें – देरी जानलेवा हो सकती है।

January 10, 2026

आधुनिक तकनीक से अब ब्रेन ट्यूमर का इलाज ज्यादा सुरक्षित

आधुनिक तकनीक से अब ब्रेन ट्यूमर का इलाज ज्यादा सुरक्षित

गुवाहाटी: ब्रेन ट्यूमर मस्तिष्क या खोपड़ी के भीतर सेल्स की असामान्य वृद्धि को कहा जाता हैजो सेल्स के अनियंत्रित विभाजन के कारण होती है। ये ट्यूमर सीधे मस्तिष्क में उत्पन्न हो सकते हैंजिन्हें प्राइमरी ब्रेन ट्यूमर कहा जाता हैया फिर शरीर के किसी अन्य हिस्से में मौजूद कैंसर से फैलकर मस्तिष्क तक पहुंच सकते हैंजिन्हें सेकेंडरी या मेटास्टेटिक ब्रेन ट्यूमर कहा जाता है। ट्यूमर की प्रकृति और उसकी स्थिति के अनुसार यह ब्रेन टिशूसब्लड वेसल्सक्रेनियल नर्व्समेनिंजीजखोपड़ीपिट्यूटरी ग्लैंड या पीनियल ग्लैंड को प्रभावित कर सकता हैजिससे कई तरह की न्यूरोलॉजिकल समस्याएं पैदा हो सकती हैं। 


ब्रेन ट्यूमर के इलाज में समय पर पहचान और सही उपचार बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आमतौर पर जांच की शुरुआत विस्तृत न्यूरोलॉजिकल परीक्षण से होती हैजिसके बाद एमआरआई या सीटी स्कैन जैसी इमेजिंग जांच की जाती है। कुछ विशेष मामलों में सर्जरी से पहले ब्रेन एंजियोग्राफी की जाती हैजिससे ट्यूमर में रक्त आपूर्ति का आकलन किया जा सके और आवश्यकता होने पर सर्जरी से पहले उसकी रक्त आपूर्ति को कम किया जा सके। इलाज की योजना हर मरीज के लिए अलग-अलग तैयार की जाती हैजिसमें उम्रसामान्य स्वास्थ्यट्यूमर का प्रकारआकारस्थान और उसकी बायोलॉजिकल प्रकृति को ध्यान में रखा जाता है। उपचार में सर्जरीरेडिएशन थेरेपीकीमोथेरेपी या टारगेटेड दवाओं में से एक या एक से अधिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। 


मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलसाकेत के न्यूरोसर्जरी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर और हेड ऑफ यूनिट डॉ. कपिल जैन ने बताया “ब्रेन ट्यूमर को मुख्य रूप से बेनाइन और मैलिग्नेंट दो श्रेणियों में बांटा जाता है। बेनाइन ट्यूमर कैंसरयुक्त नहीं होतेलेकिन यदि वे मस्तिष्क की महत्वपूर्ण संरचनाओं जैसे बड़ी ब्लड वेसल्स , क्रेनियल नर्व्स या ब्रेनस्टेम के पास होंतो गंभीर खतरा बन सकते हैं। वहीं मैलिग्नेंट ट्यूमर कैंसरयुक्त होते हैंजो या तो सीधे मस्तिष्क में विकसित होते हैं या फेफड़ेस्तनकिडनीकोलन या त्वचा जैसे अंगों के कैंसर से फैलकर मस्तिष्क तक पहुंचते हैं। कुछ मामलों में ब्रेन मेटास्टेसिस के लक्षण तब दिखाई देते हैंजब मूल कैंसर का पता भी नहीं चला होता। अधिकतर प्राइमरी ब्रेन ट्यूमर के सटीक कारण अभी स्पष्ट नहीं हैंलेकिन कुछ जोखिम कारक पहचाने गए हैं। आयोनाइजिंग रेडिएशन के संपर्क में आनाजैसे पहले की गई रेडियोथेरेपी या बार-बार हाई डोज इमेजिंग जांचब्रेन ट्यूमर के खतरे को बढ़ा सकती है। कुछ आनुवंशिक बीमारियों में भी ब्रेन ट्यूमर की संभावना अधिक होती है। इसके अलावाकमजोर इम्यून सिस्टम वाले लोगजैसे एचआईवी या एड्स से पीड़ित मरीजकुछ प्रकार के ब्रेन ट्यूमर के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।“ 


ब्रेन ट्यूमर के लक्षण ट्यूमर के आकारप्रकार और स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ ट्यूमर लंबे समय तक बिना किसी लक्षण के भी रह सकते हैं। आम लक्षणों में लगातार या बार-बार होने वाला सिरदर्दजो अक्सर उल्टी के साथ होता हैदौरे पड़नानजर से जुड़ी समस्याएं जैसे धुंधला या दोहरा दिखनासुनने में कमीचक्कर आनाशरीर के किसी हिस्से में कमजोरी या लकवाहाथ-पैरों में सुन्नपनयाददाश्त कमजोर होनाव्यक्तित्व या व्यवहार में बदलावसंतुलन और तालमेल में परेशानीचेहरे में दर्द या असामान्य गतिविधियां शामिल हैं। ऐसे किसी भी लक्षण के दिखने पर तुरंत किसी विशेष न्यूरो सेंटर में जांच कराना जरूरी है। 


डॉ. कपिल ने आगे बताया “मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज में ब्रेन ट्यूमर के इलाज के लिए सभी आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। सर्जरी के दौरान यदि ट्यूमर मस्तिष्क के बेहद संवेदनशील हिस्सों के पास होतो न्यूरोलॉजिकल नुकसान के खतरे को कम करने के लिए आंशिक सर्जरी की जाती हैजबकि सुरक्षित स्थिति में पूरा ट्यूमर निकालने का प्रयास किया जाता है। कुछ खास स्कल बेस ट्यूमर जैसे पिट्यूटरी एडेनोमा और क्लाइवल कॉर्डोमा में एंडोस्कोपिक सर्जरी का उपयोग किया जाता है। गहराई में स्थित या एक से अधिक ट्यूमर के मामलों में स्टीरियोटैक्टिक बायोप्सी के जरिए अत्यंत सटीक तरीके से डायग्नोसिस किया जाता है। रेडिएशन थेरेपी में फोकस्ड आयोनाइजिंग रेडिएशन का इस्तेमाल कर कैंसर सेल्स को नष्ट किया जाता हैजबकि आसपास के स्वस्थ टिश्यू को सुरक्षित रखा जाता है। कीमोथेरेपी में ऐसी दवाओं का प्रयोग किया जाता हैजो विशेष रूप से कैंसर सेल्स को निशाना बनाती हैं। कुछ धीमी गति से बढ़ने वाले बेनाइन ट्यूमर में नियमित जांच के साथ ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति भी अपनाई जाती है।“  


हालांकि सभी ब्रेन ट्यूमर को पूरी तरह रोका नहीं जा सकताफिर भी कुछ उपाय जोखिम को कम करने में मदद कर सकते हैं। अनावश्यक आयोनाइजिंग रेडिएशन से बचनाकार्यस्थलों पर सुरक्षा मानकों का पालन करनापरिवार में ब्रेन ट्यूमर का इतिहास होने पर जेनेटिक काउंसलिंग कराना और एचआईवी या एड्स जैसी स्थितियों का सही प्रबंधन कर इम्यून सिस्टम को मजबूत रखना इसमें शामिल हैं। ब्रेन ट्यूमर के बेहतर इलाज और अच्छे परिणाम के लिए जागरूकतासमय पर पहचान और विशेषज्ञ चिकित्सा सुविधा तक पहुंच सबसे अहम कारक हैं। 

December 29, 2025

पीठ दर्द को नजरअंदाज न करें, समय पर इलाज से बच सकती है सर्जरी

पीठ दर्द को नजरअंदाज न करें, समय पर इलाज से बच सकती है सर्जरी

पलवलपीठ दर्द एक आम समस्या है जो किसी भी उम्र में किसी को भी हो सकती है। आज लगभग हर व्यक्ति अपने जीवनकाल में किसी न किसी समय पीठ दर्द का अनुभव करता हैलेकिन राहत की बात यह है कि लगभग 95% मामलों में यह दर्द बिना सर्जरी के ही जीवनशैली में बदलावदवाओंफिजियोथेरेपी और अन्य नॉन-सर्जिकल थेरेपी से ठीक किया जा सकता है। केवल 5% मामलों में गंभीर दर्द या इलाज का असर न होने पर सर्जरी की आवश्यकता होती है। 


पीठ दर्द से बचाव ही इसका सबसे अच्छा इलाज है। उम्र के साथ रीढ़ की हड्डी के जोड़ोंडिस्क और हड्डियों में होने वाले बदलाव (डिजेनेरेटिव स्पाइन डिजीज) से होने वाले पुराने पीठ दर्द को स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर काफी हद तक रोका या धीमा किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति अपना वजन नियंत्रित रखेरोजाना एक्सरसाइज करेसही पॉश्चर अपनाए और धूम्रपान से दूर रहे। यह सब रीढ़ की मांसपेशियों को मजबूत बनाने और लंबे समय तक स्पाइनल हेल्थ बनाए रखने में सहायक होता है। 


मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलसाकेत के न्यूरोसर्जरी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर एंड यूनिट हेड डॉ. कपिल जैन ने बताया कि “हालांकिकुछ संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। अगर किसी को लगातार बढ़ता हुआ पीठ दर्द होआराम करने पर भी राहत न मिलेपैरों या हाथों में सुन्नताकमजोरी या झनझनाहट होबुखार या पाचन/मूत्र संबंधी लक्षणों के साथ दर्द होया कैंसर के इतिहास वाले मरीजों को पीठ में दर्द होतो तुरंत न्यूरोसर्जन या स्पाइन स्पेशलिस्ट से संपर्क करना चाहिए। ये संकेत किसी गंभीर रोग की ओर इशारा कर सकते हैं। पीठ दर्द के सही कारणों का पता लगाने के लिए आमतौर पर एमआरआई सबसे उपयुक्त जांच होती हैजिससे हर्नियेटेड डिस्कस्पाइनल स्टेनोसिससंक्रमणट्यूमर या अन्य डिजेनेरेटिव बदलावों का पता चल सकता है। इसके आधार पर डॉक्टर दवाएंफिजियोथेरेपीआराम और जीवनशैली में बदलाव जैसे कंजरवेटिव ट्रीटमेंट शुरू करते हैं और अधिकांश मरीज कुछ ही हफ्तों में बेहतर महसूस करते हैं।“ 


अगर इलाज के बावजूद लक्षण बने रहें या बढ़ जाएंतो फिर सर्जरी की सलाह दी जाती है। आजकल माइक्रोस्कोपिक और एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी जैसे आधुनिक और मिनिमली इनवेसिव विकल्प मौजूद हैंजिनमें छोटा चीराकम मांसपेशियों की क्षति और जल्दी ठीक होने की संभावना होती है। ये सर्जरी सामान्यत: रीजनल या लोकल एनेस्थीसिया के तहत की जाती हैं और कुशल सर्जनों द्वारा बेहतरीन परिणाम मिलते हैं। 


पीठ दर्द आम जरूर हैलेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। विशेष संकेतों की स्थिति में तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लेंक्योंकि समय रहते इलाज से दर्द रहित और स्वस्थ जीवन संभव है।

December 24, 2025

जानलेवा ब्रेन एन्यूरिज़्म में मिनिमली इनवेसिव तकनीक बनी जीवनरक्षक

जानलेवा ब्रेन एन्यूरिज़्म में मिनिमली इनवेसिव तकनीक बनी जीवनरक्षक
एंडोवैस्कुलर तकनीक से ब्रेन एन्यूरिज़्म का इलाज अब पहले से ज्यादा सुरक्षित 

बरेलीएन्यूरिज़्म ब्लड वेसल्स की दीवारों में बनने वाला असामान्य उभार या फुलाव होता हैजो अधिकतर आर्टरीज़ में देखा जाता है। यह शरीर के विभिन्न हिस्सों में हो सकता हैजैसे दिमागएओर्टा या पेरिफेरल आर्टरीज़ में। कई बार एन्यूरिज़्म छोटे रहते हैं और कोई लक्षण नहीं देतेलेकिन कुछ मामलों में यह धीरे-धीरे बढ़ते हैं और फटने पर जानलेवा स्थिति पैदा कर सकते हैं। जब एन्यूरिज़्म दिमाग की  ब्लड वेसल्स में होता हैतो उसे सेरेब्रल एन्यूरिज़्म कहा जाता है। इसके फटने से सबएरैक्नॉइड हैमरेज हो सकता हैजो समय पर इलाज न होने पर गंभीर कॉम्प्लीकेशन्स और मृत्यु का कारण बन सकता है। 


परंपरागत रूप से ब्रेन एन्यूरिज़्म का इलाज ओपन सर्जरी से किया जाता थाजिसमें न्यूरोसर्जन को क्रैनियोटॉमी करके सीधे प्रभावित ब्लड वेसल्स तक पहुंचना पड़ता था और एन्यूरिज़्म के बेस पर क्लिप लगाई जाती थी। यह तरीका प्रभावी जरूर थालेकिन काफी इनवेसिव होने के कारण इसमें रिकवरी का समय ज्यादा लगता था और खासकर बुजुर्ग मरीजों या अन्य बीमारियों से ग्रस्त मरीजों में जोखिम भी अधिक रहता था। 


मेदांता सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलनोएडा के न्यूरोइंटरवेंशन एवं स्ट्रोक विभाग के डायरेक्टर डॉ. गिरिश राजपाल ने बताया कि आज के समय में एंडोवैस्कुलर थेरेपी ब्रेन एन्यूरिज़्म के इलाज के लिए एक मिनिमली इनवेसिव और अत्यंत प्रभावी विकल्प के रूप में उभरी है। इस तकनीक में ओपन सर्जरी की जरूरत नहीं होतीबल्कि ग्रोइन या कलाई में एक छोटे से पंक्चर के जरिए ब्लड वेसल्स के भीतर से ही एन्यूरिज़्म तक पहुंचा जाता है। डिजिटल सब्ट्रैक्शन एंजियोग्राफी जैसी एडवांस इमेजिंग तकनीकों की मदद से माइक्रोकैथेटर को बेहद सटीक तरीके से दिमाग की ब्लड वेसल्स के भीतर आगे बढ़ाया जाता है। एन्यूरिज़्म तक पहुंचने के बाद उसका इलाज विभिन्न आधुनिक तरीकों से किया जाता है। कॉइलिंग तकनीक में प्लैटिनम की बेहद पतली कॉइल्स को एन्यूरिज़्म के अंदर डाला जाता हैजिससे वहां ब्लड क्लॉट बन जाता है और एन्यूरिज़्म में ब्लड फ्लो रुक जाता है। वहीं फ्लो डाइवर्टर जैसे स्टेंट-लाइक डिवाइस एन्यूरिज़्म की गर्दन पर लगाए जाते हैंजिससे खून का बहाव उभार से हटकर सामान्य ब्लड वेसल्स की ओर मुड़ जाता है और समय के साथ एन्यूरिज़्म खुद ही बंद होने लगता है।“    


डॉ. गिरिश ने आगे बताया कि एंडोवैस्कुलर थेरेपी के कई महत्वपूर्ण फायदे हैं। यह मिनिमली इनवेसिव होने के कारण मरीज को कम दर्दकम ब्लड लॉस और कम समय में अस्पताल से छुट्टी मिलने का लाभ देती है। रिकवरी तेजी से होती है और रोजमर्रा की जिंदगी में वापसी भी जल्दी संभव होती है। जो मरीज ओपन सर्जरी के लिए हाई रिस्क माने जाते हैंउनके लिए यह तकनीक कहीं अधिक सुरक्षित विकल्प साबित होती है। आधुनिक इमेजिंग और नेविगेशन सिस्टम की मदद से डिवाइस की सटीक प्लेसमेंट संभव होती हैजिससे इलाज की सफलता दर भी बेहतर होती है और कॉम्प्लिकेशन का खतरा कम होता है।“ 


हालांकिकिसी भी मेडिकल प्रोसीजर की तरह एंडोवैस्कुलर इलाज में भी कुछ जोखिम हो सकते हैंजैसे पंक्चर साइट पर ब्लीडिंगब्लड वेसल्स को नुकसान या क्लॉट बनने की संभावना। कुछ मामलों में एन्यूरिज़्म दोबारा उभर सकता हैजिसके लिए फॉलो-अप इमेजिंग और कभी-कभी दोबारा इलाज की जरूरत पड़ती है। लेकिन अनुभवी विशेषज्ञों और अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है। 


कुल मिलाकरएंडोवैस्कुलर थेरेपी ने ब्रेन एन्यूरिज़्म के इलाज की दिशा ही बदल दी है। यह मरीजों को एक ऐसा लाइफ-सेविंग विकल्प देती हैजिसमें प्रिसिशनसेफ्टी और तेज रिकवरी का बेहतरीन संतुलन होता है। एन्यूरिज़्म के प्रति जागरूकतासमय पर जांच और सही समय पर इलाज मरीज की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। लगातार विकसित हो रही डिवाइस टेक्नोलॉजी और तकनीकों के साथ भविष्य में एन्यूरिज़्म का इलाज पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनता जा रहा है।