सोनीपत: कैंसर असामान्य सेल्स की अनियंत्रित वृद्धि से होने वाली एक गंभीर बीमारी है, जो आज भी दुनिया भर में मृत्यु का बड़ा कारण बनी हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर साल लगभग एक करोड़ लोगों की मौत कैंसर के कारण होती है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। हालांकि, कैंसर को अब केवल मौत का पर्याय नहीं माना जाता। समय रहते पहचान यानी अर्ली डिटेक्शन से न केवल इलाज के विकल्प बढ़ते हैं, बल्कि मरीज के जीवित रहने की संभावना भी कई गुना बढ़ जाती है।
कैंसर आमतौर पर धीरे-धीरे विकसित होता है और शुरुआत में यह सीमित दायरे में असामान्य सेल्स के छोटे समूह के रूप में होता है। जैसे-जैसे ये सेल्स बढ़ते हैं, ट्यूमर बनता है और अगर समय पर इलाज न हो तो कैंसर शरीर के अन्य हिस्सों में फैल सकता है। एक बार कैंसर फैल जाए तो उसका इलाज अधिक जटिल हो जाता है और उपचार का असर भी सीमित हो सकता है। इसी वजह से शुरुआती अवस्था में कैंसर की पहचान बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। प्रारंभिक स्टेज में पकड़े गए कैंसर में सर्जरी, रेडिएशन या कीमोथेरेपी जैसे उपचार अधिक प्रभावी होते हैं और कई मामलों में बीमारी पूरी तरह ठीक भी हो सकती है।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल,
द्वारका के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ.
संजीव कुमार ने बताया
“अर्ली डिटेक्शन का सबसे बड़ा फायदा सर्वाइवल रेट में स्पष्ट बढ़ोतरी है। ब्रेस्ट,
प्रोस्टेट और कोलन कैंसर जैसे कई कैंसर यदि शुरुआती स्टेज में पकड़ में आ जाएं,
तो मरीज के लंबे और स्वस्थ जीवन की संभावना काफी बढ़ जाती है। शुरुआती अवस्था में कैंसर सीमित क्षेत्र तक रहता है,
जिससे इलाज के कई विकल्प उपलब्ध होते हैं और अत्यधिक आक्रामक उपचार की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसके साथ ही,
अर्ली डिटेक्शन इलाज की लागत को भी कम करता है क्योंकि शुरुआती इलाज अपेक्षाकृत सरल,
कम समय वाला और कम खर्चीला होता है,
जबकि एडवांस स्टेज में लंबे इलाज और अस्पताल में भर्ती होने से आर्थिक बोझ बढ़ जाता है।“
डॉ. संजीव ने आगे बताया “कैंसर की अर्ली डिटेक्शन के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट, इमेजिंग तकनीक, जेनेटिक टेस्टिंग और ब्लड टेस्ट का सहारा लिया जाता है। मैमोग्राफी, पैप स्मियर, कोलोनोस्कोपी, पीएसए टेस्ट और स्किन एग्जाम जैसे स्क्रीनिंग टेस्ट लक्षण दिखने से पहले ही कैंसर की पहचान में मदद करते हैं। वहीं सीटी स्कैन, एमआरआई और पीईटी स्कैन जैसी इमेजिंग तकनीकें शरीर के अंदर मौजूद असामान्य बदलावों को स्पष्ट रूप से दिखाती हैं। जिन लोगों में पारिवारिक इतिहास होता है, उनके लिए जेनेटिक टेस्टिंग जोखिम को समझने और समय से जांच शुरू करने में सहायक हो सकती है। इसके अलावा, लिक्विड बायोप्सी जैसे ब्लड टेस्ट भविष्य में बिना सर्जरी के बहुत शुरुआती स्टेज में कैंसर पकड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।“
हालांकि अर्ली डिटेक्शन के कई फायदे हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं। सभी प्रकार के कैंसर के लिए प्रभावी स्क्रीनिंग टेस्ट उपलब्ध नहीं हैं, जैसे पैंक्रियाटिक या ओवेरियन कैंसर। इसके अलावा, ग्रामीण या कम संसाधन वाले क्षेत्रों में जांच सुविधाओं की सीमित उपलब्धता भी एक बड़ी समस्या है। कुछ मामलों में ओवर-डायग्नोसिस की आशंका भी रहती है, जहां धीमी गति से बढ़ने वाले कैंसर का पता चल जाता है, जो शायद जीवन भर कोई नुकसान न करता। इसलिए जरूरी है कि स्क्रीनिंग का निर्णय व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य और पारिवारिक इतिहास को ध्यान में रखकर विशेषज्ञ की सलाह से लिया जाए।
कुल मिलाकर, कैंसर से लड़ाई में अर्ली डिटेक्शन सबसे प्रभावी हथियार है। नियमित जांच, सही जानकारी और समय पर चिकित्सकीय सलाह से न केवल जान बचाई जा सकती है, बल्कि मरीज को बेहतर और सम्मानजनक जीवन भी दिया जा सकता है।











