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February 23, 2026

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर का खतरा घटाने में स्क्रीनिंग और स्वस्थ जीवनशैली की अहम भूमिका

गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर का खतरा घटाने में स्क्रीनिंग और स्वस्थ जीवनशैली की अहम भूमिका

 झज्जर: गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर (GI कैंसर) वे कैंसर हैं जो पाचन तंत्र के विभिन्न अंगों जैसे भोजन नली (इसोफेगस)पेटलिवरपैंक्रियाजछोटी आंतकोलनरेक्टम और गुदा में शुरू होते हैं। ये कैंसर आमतौर पर 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में अधिक देखे जाते हैंलेकिन कुछ जोखिम कारकों के कारण कम उम्र में भी हो सकते हैं।


अच्छी बात यह है कि इनमें से कई कैंसर का समय रहते पता लगाया जा सकता हैजिससे इलाज के परिणाम बेहतर होते हैं और जीवन बचाने की संभावना बढ़ जाती है। इसलिए शुरुआती लक्षणों के प्रति जागरूक रहना और नियमित स्क्रीनिंग करवाना बेहद महत्वपूर्ण है।


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलशालीमार बाग के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के एसोसिएट डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. अनादी पचौरी ने बताया “कोलोरेक्टल कैंसरजो कोलन या रेक्टम में होता हैभारत में काफी सामान्य है। इसके लक्षणों में बार-बार दस्त या कब्जमल में खूनपेट दर्दबिना कारण वजन कम होना और कमजोरी शामिल हैं। 50 वर्ष से अधिक उम्रपरिवार में कैंसर का इतिहासमोटापाधूम्रपानकम फाइबर वाला आहार और आंतों की पुरानी सूजन इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। कोलोनोस्कोपी जांच के माध्यम से इस कैंसर को शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है और कैंसर बनने से पहले पॉलिप्स को हटाकर इसे रोका भी जा सकता है। पेट का कैंसरजिसे गैस्ट्रिक कैंसर भी कहा जाता हैपेट की अंदरूनी परत में विकसित होता है। इसके लक्षणों में लगातार एसिडिटीअपचपेट दर्दमतलीउल्टीभूख कम लगना और वजन कम होना शामिल हैं। यह कैंसर अक्सर H. pylori संक्रमणधूम्रपानअधिक शराब सेवन और पारिवारिक इतिहास से जुड़ा होता है। उच्च जोखिम वाले लोगों में एंडोस्कोपी जांच और H. pylori संक्रमण का इलाज इस कैंसर के जोखिम को कम कर सकता है। जिन लोगों के परिवार में कैंसर का इतिहास हैउनके लिए जेनेटिक काउंसलिंग भी उपयोगी हो सकती है।


डॉ. अनादी ने आगे बताया “इसोफेगल कैंसर भोजन नली में होता है और भारत में तंबाकू और शराब के सेवन के कारण इसका खतरा अधिक है। इसके मुख्य लक्षणों में निगलने में कठिनाईछाती में दर्दआवाज में बदलाववजन कम होना और भोजन का वापस आना शामिल हैं। इसी तरह लिवर कैंसर अक्सर हेपेटाइटिस B या C संक्रमणसिरोसिसफैटी लिवर और अत्यधिक शराब सेवन के कारण होता है। इसके लक्षणों में पीलियापेट में सूजन या दर्दथकान और वजन कम होना शामिल हैं। हेपेटाइटिस B का टीकाकरणसमय पर इलाज और हाई-रिस्क लोगों में नियमित अल्ट्रासाउंड जांच से इस कैंसर को रोका या शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है। पैंक्रियाज का कैंसर अक्सर देर से पता चलता है क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण स्पष्ट नहीं होते। इसके लक्षणों में पीलियापेट या पीठ में दर्दभूख कम लगनाअचानक वजन कम होना और कमजोरी शामिल हैं। धूम्रपानमोटापाडायबिटीजपारिवारिक इतिहास और पुरानी पैंक्रियाज की बीमारी इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं। ऐसे किसी भी लक्षण को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए।


गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर से बचाव के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाना बेहद जरूरी है। संतुलित आहार जिसमें फलसब्जियां और साबुत अनाज शामिल होंनियमित व्यायामवजन नियंत्रणतंबाकू से दूरी और शराब का सीमित सेवन जोखिम को कम करता है। इसके अलावा हेपेटाइटिस B और HPV का टीकाकरणसमय-समय पर कोलोनोस्कोपी जैसी स्क्रीनिंग जांच, H. pylori और हेपेटाइटिस संक्रमण का इलाजऔर परिवार में कैंसर का इतिहास होने पर जेनेटिक काउंसलिंग करवाना भी महत्वपूर्ण है। यदि मल में खूनलगातार पेट दर्द या बिना कारण वजन कम होने जैसे लक्षण दिखाई देंतो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए।


संक्षेप मेंगैस्ट्रोइंटेस्टाइनल कैंसर को काफी हद तक रोका जा सकता है या शुरुआती अवस्था में पकड़ा जा सकता है। नियमित स्क्रीनिंगसही जीवनशैलीसमय पर टीकाकरण और किसी भी असामान्य लक्षण की अनदेखी करनाकैंसर के खतरे को कम करने और सफल इलाज सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुरुआती पहचान से इलाज अधिक प्रभावी होता है और मरीज के स्वस्थ जीवन की संभावना काफी बढ़ जाती है।

February 21, 2026

लगातार थकान और बार-बार इंफेक्शन को न करें नजरअंदाज, हो सकता है ब्लड डिसऑर्डर


लगातार थकान और बार-बार इंफेक्शन को न करें नजरअंदाज, हो सकता है ब्लड डिसऑर्डर

ग्वालियर: ब्लड डिसऑर्डर यानी रक्त संबंधी बीमारियाँ उन स्थितियों का बड़ा समूह हैंजो शरीर की ब्लड सेल्स को बनानेनियंत्रित करने या सही तरीके से काम करने की क्षमता को प्रभावित करती हैं। ये बीमारियाँ हल्की और मैनेजेबल भी हो सकती हैं और कुछ मामलों में गंभीर व जानलेवा भी बन सकती हैं। अच्छी बात यह है कि आज जागरूकताएडवांस डायग्नोस्टिक टेस्ट और आधुनिक ट्रीटमेंट ऑप्शन की मदद से अधिकांश ब्लड डिसऑर्डर का प्रभावी इलाज संभव है और कई मामलों में पूरी तरह ठीक भी किया जा सकता है।


रक्त विकारों को सामान्य रूप से रेड ब्लड सेलव्हाइट ब्लड सेलप्लेटलेट और बोन मैरो से जुड़ी समस्याओं में बांटा जाता है। आयरन-डिफिशिएंसी एनीमियाथैलेसीमिया और सिकल सेल डिजीज जैसी रेड ब्लड सेल से जुड़ी बीमारियों में मरीज को कमजोरीचक्कर आनासांस फूलना और त्वचा का पीला पड़ना जैसे लक्षण दिख सकते हैं। थैलेसीमिया मेजर और सिकल सेल जैसी जेनेटिक कंडीशन में अक्सर लंबे समय तक इलाज की जरूरत होती है और कई मामलों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) एक क्योर देने वाला विकल्प साबित होता है।


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलवैशाली के क्लिनिकल हीमैटोलॉजीहीमैटो-ऑन्कोलॉजी एवं बीएमटी विभाग की कंसल्टेंट डॉ. मालिनी गर्ग ने बताया व्हाइट ब्लड सेल डिसऑर्डर में ल्यूकेमियालिम्फोमा और इम्यून-डिफिशिएंसी जैसी बीमारियाँ शामिल हैं। इनमें बार-बार इंफेक्शन होनालंबे समय तक बुखार रहनाबिना कारण वजन कम होना या लिम्फ नोड्स का बढ़ना जैसे संकेत मिल सकते हैं। समय पर जांच और डायग्नोसिस से इलाज के नतीजे काफी बेहतर होते हैं। वहीं प्लेटलेट और ब्लीडिंग डिसऑर्डर जैसे आईटीपीहीमोफीलिया या क्लॉटिंग एबनॉर्मैलिटी में मामूली चोट पर ज्यादा खून बहनाबार-बार नाक से खून आना या सर्जरी के दौरान अत्यधिक ब्लीडिंग जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। आधुनिक थेरेपी से इन स्थितियों को अच्छी तरह कंट्रोल किया जा सकता है। कुछ गंभीर स्थितियों में बोन मैरो खुद ही पर्याप्त और स्वस्थ ब्लड सेल्स बनाना बंद कर देता हैजैसे एप्लास्टिक एनीमिया या एमडीएस। ऐसे मामलों में कमजोरीबार-बार इंफेक्शन और ब्लीडिंग एपिसोड देखने को मिलते हैं। इन रोगों में लंबे समय के समाधान के लिए बीएमटी जरूरी हो सकता है। बोन मैरो ट्रांसप्लांटजिसे हीमैटोपोएटिक स्टेम सेल ट्रांसप्लांट भी कहा जाता हैतब किया जाता है जब मरीज का बोन मैरो सामान्य रूप से काम नहीं कर पा रहा हो। यह हाई-रिस्क या रिलेप्स ल्यूकेमियाथैलेसीमिया मेजरसिकल सेल डिजीजएप्लास्टिक एनीमिया और कुछ जन्मजात बीमारियों में जीवनरक्षक साबित हो सकता है।


आज बीएमटी के लिए डोनर के कई विकल्प उपलब्ध हैंजैसे मैच्ड सिबलिंग डोनररजिस्ट्री से मैच्ड अनरिलेटेड डोनर और हैप्लो-आइडेंटिकल यानी आधा मैच डोनर। बेहतर इंफेक्शन कंट्रोलएडवांस कंडीशनिंग रेजीमेन और पोस्ट-ट्रांसप्लांट मॉनिटरिंग के कारण ट्रांसप्लांट की सफलता दर में काफी सुधार हुआ है। खासकर बच्चों और युवाओं में समय पर इलाज शुरू होने पर क्योर रेट काफी बेहतर देखी गई है।


डॉ. मालिनी ने आगे बताया ब्लड डिसऑर्डर को लेकर कई मिथक भी प्रचलित हैं। लोग मानते हैं कि ये बीमारियाँ बहुत दुर्लभ हैं या इनके लक्षण हमेशा स्पष्ट दिखते हैंजबकि कई मामलों में बीमारी लंबे समय तक बिना लक्षण के बढ़ती रहती है। बोन मैरो डोनेशन को लेकर भी डर होता हैजबकि आज अधिकांश डोनेशन सुरक्षित ब्लड-फिल्टरिंग प्रोसेस के जरिए होते हैं और असुविधा अस्थायी होती है। यह भी जरूरी है समझना कि बीएमटी सिर्फ कैंसर मरीजों के लिए नहींबल्कि कई नॉन-कैंसर कंडीशन में भी क्योर का विकल्प है। हीमैटो-ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में टार्गेटेड थेरेपीइम्यूनोथेरेपीमोनोक्लोनल एंटीबॉडीचुनिंदा मामलों में CAR-T थेरेपी और प्रिसिजन डायग्नोस्टिक्स ने इलाज के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। अब ट्रीटमेंट केवल सर्वाइवल तक सीमित नहीं हैबल्कि मरीज की बेहतर क्वालिटी ऑफ लाइफ पर भी फोकस करता है।


लगातार थकानबार-बार इंफेक्शनबिना कारण चोट के निशानवजन कम होनाहड्डियों में दर्द या लंबे समय तक बुखार जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर ब्लड टेस्टबोन मैरो स्टडी और जेनेटिक स्क्रीनिंग के जरिए सही डायग्नोसिस संभव है।


बोन मैरो ट्रांसप्लांट और आधुनिक हीमैटो-ऑन्कोलॉजी ट्रीटमेंट डर का नहींबल्कि उम्मीद का प्रतीक हैं। सही समय पर विशेषज्ञ से परामर्श और उचित इलाज जीवन बचा सकता है। यदि आपको या आपके किसी परिजन को ऐसे लक्षण दिखेंतो जांच में देरी न करेंक्योंकि समय पर उठाया गया कदम ही सबसे बड़ा अंतर ला सकता है।