हाल ही में जयपुर से एक झकझोर देने वाला मामला सामने आया, जिसने पूरे समाज को स्तब्ध कर दिया। नौ साल की मासूम अमायरा ने स्कूल में
बुलिंग के कारण कूदकर आत्महत्या कर ली। छोटी सी उम्र में अमायरा का यह कदम न सिर्फ
उसके परिवार को विध्वंसित कर गया,
बल्कि पूरे देश को बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य की
गंभीर समस्या की याद दिला गया। बताया जा रहा है कि अमायरा लंबे समय से स्कूल में
बुलिंग का शिकार हो रही थी। सहपाठियों के ताने, अपमान और लगातार प्रताड़ना ने उसके
नन्हे मन को तोड़ दिया। इस घटना के बाद सीबीएसई ने स्कूल की मान्यता रद्द कर दी, जो एक सख्त कदम जरूर है,
लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या यह पर्याप्त है? बुलिंग सिर्फ बच्चों की मस्ती-मजाक या नोकझोंक नहीं, बल्कि यह एक गंभीर समस्या है जो बच्चों के मेंटल हेल्थ पर गहरा असर डालती है।
तुलसी हेल्थकेयर, गुरुग्राम के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. गौरव गुप्ता कहते हैं, "बुलिंग बच्चों के दिमाग में एक जहर की तरह घुल जाती है। यह तत्कालीन दर्द से
कहीं ज्यादा खतरनाक है,
क्योंकि यह लंबे समय तक चिंता, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी पैदा करती है। अमायरा जैसी घटनाएं साबित करती हैं
कि अनदेखी बुलिंग घातक हो सकती है।"
बुलिंग क्या है और यह कैसे फैलती है?
बुलिंग कोई नई समस्या नहीं है,
लेकिन आज के डिजिटल युग में यह और भी जटिल हो गई है।
पारंपरिक बुलिंग में शारीरिक धक्का-मुक्की,
ताने मारना या बहिष्कार शामिल होता है, जबकि साइबर बुलिंग सोशल मीडिया,
व्हाट्सएप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर ट्रोलिंग, फेक वीडियो या अपमानजनक मैसेज के रूप में सामने आती है। भारत में एक सर्वे के
अनुसार, 30% से अधिक स्कूली बच्चे बुलिंग का शिकार होते हैं, और लड़कियां भावनात्मक बुलिंग से ज्यादा प्रभावित होती हैं। अमायरा का मामला
इसी का उदाहरण है, जहां लगातार अपमान ने उसके मन को तोड़ दिया। डॉ. गौरव
गुप्ता बताते हैं,
"बच्चों का दिमाग अभी विकसित हो रहा
होता है। बुलिंग से कोर्टिसोल हार्मोन बढ़ता है, जो तनाव पैदा करता है। लंबे समय तक
यह PTSD (पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) जैसी स्थिति बना सकता
है। अमायरा ने जो कदम उठाया,
वह निरंतर दबाव का परिणाम था।"
मेंटल हेल्थ पर बुलिंग का गहरा प्रभाव
बुलिंग बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को कई स्तरों पर प्रभावित करती है। सबसे
पहले, यह आत्मसम्मान को चूर-चूर कर देती है। बच्चा खुद को कमतर
समझने लगता है, जिससे चिंता विकार (एंग्जायटी डिसऑर्डर) हो जाता है। स्कूल
जाने से डर लगना, नींद न आना,
भूख न लगना—ये सामान्य लक्षण हैं। डॉ. गुप्ता कहते
हैं, "हमारे क्लिनिक में 40%
बच्चे बुलिंग से जुड़े अवसाद के केस लेकर आते हैं। यह
डिप्रेशन मस्तिष्क के सेरोटोनिन लेवल को असंतुलित करता है, जो खुशी के हार्मोन को कम कर देता है। अमायरा जैसी बच्चियां अक्सर अकेलापन
महसूस करती हैं और मदद मांगने से डरती हैं।"
दूसरा बड़ा प्रभाव है आत्महत्या का खतरा। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, बुलिंग के शिकार बच्चों में सुसाइड रिस्क 2-9 गुना बढ़ जाता है। भारत में हर साल सैकड़ों बच्चे इसी कारण अपनी जान गंवा देते
हैं। अमायरा की मौत ने साबित कर दिया कि नौ साल की उम्र में भी बच्चे इतना दर्द
सहन नहीं कर पाते। इसके अलावा,
बुलिंग से एगोरेनिक डिसऑर्डर, सोशल फोबिया और यहां तक कि ड्रग एब्यूज की प्रवृत्ति भी बढ़ सकती है। डॉ.
गुप्ता जोड़ते हैं,
"बुलिंग का शिकार बच्चा वयस्क होने
पर भी रिश्तों में विश्वास की कमी महसूस करता है। यह intergenerational trauma पैदा कर सकती है,
जहां पीड़ित खुद बुली बन जाता है।"
रोकथाम के उपाय: स्कूल, परिवार और समाज की जिम्मेदारी
अमायरा जैसी त्रासदियों को रोकने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। स्कूलों
में एंटी-बुलिंग पॉलिसी लागू होनी चाहिए,
जैसे काउंसलिंग सेशन, पीयर मॉनिटरिंग और जीरो टॉलरेंस
नियम। सीबीएसई का कदम सकारात्मक है,
लेकिन सभी बोर्ड्स को इसे अनिवार्य करना चाहिए।
अभिभावकों को बच्चों की छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देना चाहिए। अगर बच्चा चिड़चिड़ा
हो रहा है या स्कूल से बच रहा है,
तो तुरंत मनोचिकित्सक से संपर्क करें। डॉ. गुप्ता
सलाह देते हैं, "माता-पिता को बच्चों से खुलकर बात करनी चाहिए। 'क्या हुआ स्कूल में?'
जैसे सवालों से डायलॉग शुरू करें। साथ ही, एम्पैथी सिखाएं—बच्चों को समझाएं कि दूसरों का दर्द महसूस करना कमजोरी नहीं, ताकत है।"
सरकार और एनजीओ को भी जागरूकता कैंपेन चलाने चाहिए। ऐप्स जैसे 'बुली फ्री इंडिया' विकसित किए जा सकते हैं, जहां बच्चे गुमनाम शिकायत दर्ज कर
सकें। साइबर बुलिंग के लिए सख्त साइबर लॉ लागू हों। तुलसी हेल्थकेयर जैसे संस्थान
मुफ्त काउंसलिंग प्रदान कर रहे हैं,
जिनका लाभ उठाएं।
निष्कर्ष: समय है जागने का
अमायरा की मौत एक चेतावनी है। बुलिंग बच्चों के भविष्य को नष्ट कर रही है। डॉ. गौरव गुप्ता का निष्कर्ष स्पष्ट है: "बच्चों को सुरक्षित माहौल दें, वरना हमारी अगली पीढ़ी खो जाएगी।" आइए, हम सब मिलकर इस अदृश्य हत्यारे को हराएं। स्कूल, घर और समाज—हर जगह सतर्क रहें। एक बच्चे की मुस्कान बचाना है, तो बुलिंग को जड़ से उखाड़ फेंकें।






