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March 24, 2026

ओवेरियन कैंसर को लेकर फैली गलतफहमियां क्यों हैं खतरनाक

ओवेरियन कैंसर को लेकर फैली गलतफहमियां क्यों हैं खतरनाक

 

पानीपत: महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़ी कई बीमारियों में ओवेरियन कैंसर ऐसी स्थिति है जिसके बारे में लोगों में काफी गलतफहमियां मौजूद हैं। इसे अक्सर “साइलेंट” या “हिडन” कैंसर भी कहा जाता हैक्योंकि इसके लक्षण शुरुआती चरण में स्पष्ट नहीं होते और कई बार सामान्य समस्याओं जैसे पाचन संबंधी दिक्कत या पीरियड्स से जुड़ी परेशानियों से मिलते-जुलते होते हैं। यही कारण है कि इसके कारणलक्षण और जोखिम से जुड़ी गलत जानकारी कई बार समय पर पहचान और इलाज में देरी कर देती है। यदि महिलाएं इसके बारे में सही जानकारी रखें और शरीर में होने वाले बदलावों को समझेंतो वे समय रहते डॉक्टर से सलाह लेकर अपनी सेहत की बेहतर देखभाल कर सकती हैं। 


ओवेरियन कैंसर को लेकर कई मिथक इसलिए भी बने रहते हैं क्योंकि इसे अक्सर अन्य गाइनकोलॉजिकल समस्याओं जैसे ओवेरियन सिस्ट या एंडोमेट्रियोसिस के साथ भ्रमित कर दिया जाता है। साथ ही इसके शुरुआती लक्षण बहुत हल्के या अस्पष्ट हो सकते हैंजिससे कई बार उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता है। जागरूकता की कमी और इस विषय पर खुलकर चर्चा न होने से भी गलत धारणाएं फैलती रहती हैं। सही जानकारी मिलने पर महिलाएं अपने स्वास्थ्य से जुड़े फैसले अधिक समझदारी से ले सकती हैं और जरूरत पड़ने पर समय पर जांच और उपचार करा सकती हैं। 


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलद्वारका के गाइनी सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग की सीनियर कंसल्टेंट एवं यूनिट हेड डॉ. सरिता कुमारी ने बताया सबसे आम मिथकों में से एक यह है कि ओवेरियन कैंसर केवल अधिक उम्र या मेनोपॉज के बाद की महिलाओं में ही होता है। हालांकि यह सच है कि उम्र बढ़ने के साथ इसका जोखिम बढ़ सकता हैलेकिन यह बीमारी किसी भी उम्र में हो सकती हैयहां तक कि प्रजनन आयु की महिलाओं और किशोरियों में भी। ओवेरियन कैंसर के अलग-अलग प्रकार होते हैं जो अलग-अलग उम्र में दिखाई दे सकते हैं। इसलिए हर उम्र की महिलाओं के लिए अपने गाइनकोलॉजिकल स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहना और नियमित चेक-अप कराना जरूरी है। एक और आम गलतफहमी यह है कि ओवेरियन कैंसर के लक्षण शुरुआत से ही स्पष्ट और गंभीर होते हैं। वास्तव में इसके शुरुआती संकेत अक्सर बहुत हल्के होते हैंजैसे लगातार पेट फूलनापेट या पेल्विक क्षेत्र में असहजताबार-बार पेशाब आना या भूख में बदलाव। चूंकि ये लक्षण कई सामान्य समस्याओं से मिलते-जुलते होते हैंइसलिए महिलाएं अक्सर इन्हें नजरअंदाज कर देती हैं। फर्क यह है कि ओवेरियन कैंसर से जुड़े लक्षण समय के साथ लगातार बने रहते हैं और धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं। यदि ऐसे बदलाव लंबे समय तक बने रहें तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी होता है। 


कई लोगों को यह भी लगता है कि ओवेरियन सिस्ट होने का मतलब कैंसर होना हैजबकि ऐसा नहीं है। अधिकतर सिस्ट सौम्य यानी गैर-कैंसरस होते हैं और अक्सर बिना किसी इलाज के अपने-आप ठीक हो जाते हैं। ये महिलाओं के सामान्य हार्मोनल चक्र का हिस्सा भी हो सकते हैं। हालांकि यदि कोई सिस्ट बहुत बड़ा होलंबे समय तक बना रहे या उसमें कुछ असामान्य संरचना दिखाई देतो डॉक्टर अतिरिक्त जांच की सलाह दे सकते हैं। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना होता है कि कोई गंभीर समस्या न हो। 


डॉ. सरिता ने आगे बताया “यह धारणा भी गलत है कि ओवेरियन कैंसर को बहुत देर होने तक पहचाना ही नहीं जा सकता। आज के समय में डॉक्टरों के पास कई आधुनिक जांच तकनीकें उपलब्ध हैं जिनकी मदद से ओवरी से जुड़ी असामान्यताओं का पता लगाया जा सकता है। इनमें पेल्विक एग्जामिनेशनअल्ट्रासाउंडब्लड टेस्ट जैसे CA-125 ट्यूमर मार्कर की जांचतथा आवश्यकता पड़ने पर सीटी स्कैन या एमआरआई शामिल हैं। नियमित गाइनकोलॉजिकल चेक-अप और शरीर के संकेतों के प्रति सजग रहने से संभावित समस्या का पता शुरुआती चरण में लग सकता हैजिससे उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है। एक और आम मिथक यह है कि ओवेरियन कैंसर केवल उन्हीं महिलाओं को होता है जिनके परिवार में पहले से इसका इतिहास हो। जबकि पारिवारिक इतिहास एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक हो सकता हैलेकिन यह अकेला कारण नहीं है। उम्र बढ़नाएंडोमेट्रियोसिसकुछ हार्मोनल कारकलंबे समय तक हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपीतथा जीवनशैली से जुड़े पहलू जैसे असंतुलित आहारशारीरिक गतिविधि की कमी और धूम्रपान भी जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। परिवार में किसी को यह बीमारी होने का मतलब यह नहीं है कि हर महिला को यह जरूर होगालेकिन ऐसे मामलों में नियमित स्क्रीनिंग और डॉक्टर की सलाह लेना अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।“ 


अंततः ओवेरियन कैंसर से बचाव और समय पर पहचान की सबसे बड़ी कुंजी जागरूकता है। यदि महिलाएं अपने शरीर में होने वाले लगातार बदलावों को समझें और उन्हें नजरअंदाज न करेंतो बीमारी का पता जल्दी लग सकता है। पेल्विक दर्दलगातार पेट फूलनाभूख में बदलाव या अन्य असामान्य लक्षण लंबे समय तक बने रहें तो तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। नियमित जांच और विशेषज्ञ से खुलकर बातचीत महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य और सुरक्षित भविष्य की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाने में मदद कर सकती है।

March 03, 2026

शादीशुदा महिलाओं को क्यों होते हैं डिप्रेशन-एंग्जायटी जैसे 7 मानसिक रोग? डॉ. गौरव गुप्ता ने बताईं वजहें और बचाव के आसान तरीके

 
शादीशुदा महिलाओं को क्यों होते हैं डिप्रेशन-एंग्जायटी जैसे 7 मानसिक रोग? डॉ. गौरव गुप्ता ने बताईं वजहें और बचाव के आसान तरीके

प्रश्न 1: भारत में शादीशुदा महिलाओं को सबसे ज्यादा कौन-सी मानसिक समस्याएं क्यों घेर लेती हैं?
डॉ. गौरव गुप्ता, जो एक प्रमुख मनोचिकित्सक हैं और जिनके पास अनुभव की भरमार है, बताते हैं कि भारत में शादी के बाद महिलाओं का एक बड़ा तबका मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर चुनौतियों से जूझता है। उनके अनुसारडिप्रेशन, एंग्जायटी, पोस्टपार्टम डिप्रेशन, एडजस्टमेंट डिसऑर्डर, घरेलू हिंसा से जुड़ा PTSD, OCD और स्लीप डिसऑर्डर जैसी सात प्रमुख मानसिक बीमारियां शादीशुदा महिलाओं में सबसे आम हैं। डॉ. गुप्ता के क्लिनिक में कई ऐसी महिला मरीज आती हैं, जो यह महसूस ही नहीं करतीं कि उनकी खराब मानसिक स्थिति का मूल कारण उनका वैवाहिक जीवन है। डॉ. गौरव गुप्ता जोर देकर कहते हैं कि अधिकतर मामलों में समस्या इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि महिलाओं को लक्षणों का एहसास नहीं होता और अगर हो भी जाए, तो इलाज का सही रास्ता नहीं पता। इससे रिकवरी लंबी खिंच जाती है।

प्रश्न 2: इन मानसिक समस्याओं से बचने के लिए सबसे पहला कदम क्या उठाना चाहिए?
डॉ. गौरव गुप्ता सलाह देते हैं कि लक्षणों को पहचानना, वजहें समझना और समय पर इलाज की जानकारी रखना जरूरी है। इसी उद्देश्य से हम यहां इन सात समस्याओं पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं, ताकि आप खुद को जागरूक बना सकें।

प्रश्न 3: डिप्रेशन शादीशुदा महिलाओं को क्यों होता है, इसके लक्षण क्या हैं और बचाव कैसे करें?
डॉ. गौरव गुप्ता के अनुसार, डिप्रेशन के मुख्य कारण हैं भावनात्मक उपेक्षा, पति-पत्नी में कलह, फर्टिलिटी इश्यूज, पोस्टपार्टम बदलाव, आर्थिक दबाव या परिवार का सपोर्ट न मिलना। लक्षण: हर वक्त उदासी, काम में मन न लगना, नींद की गड़बड़ी, लगातार थकान और उम्मीदों का अंत। बचाव: पति से खुलकर बात करें, हेल्दी दोस्तों का सर्कल बनाएं और खुद को प्राथमिकता दें। डॉ. गुप्ता कहते हैं, अगर ये लक्षण दो हफ्ते से ज्यादा रहें और दैनिक जीवन प्रभावित हो, तो तुरंत विशेषज्ञ से मिलें।

प्रश्न 4: एंग्जायटी डिसऑर्डर की क्या वजहें हैं, कैसे पहचानें और इससे कैसे निपटें?
ससुराल के दबाव, आर्थिक असुरक्षा, पेरेंटिंग स्ट्रेस या सास-ससुर से खराब रिश्ते एंग्जायटी को जन्म देते हैं, जैसा कि डॉ. गौरव गुप्ता बताते हैं। लक्षण: लगातार चिंता, बिना वजह पसीना, बेचैनी, चिड़चिड़ापन। बचाव: हेल्दी बॉउंड्री सेट करें, मेडिटेशन जैसी शांत करने वाली एक्टिविटीज अपनाएं और दिनचर्या में अनुशासन लाएं। डॉ. गुप्ता चेतावनी देते हैं कि अगर पैनिक अटैक शुरू हो जाएं, तो देर न करें—एक्सपर्ट की मदद लें।

प्रश्न 5: पोस्टपार्टम डिप्रेशन डिलीवरी के बाद क्यों आता है, इसके संकेत क्या हैं?
डॉ. गौरव गुप्ता स्पष्ट करते हैं कि हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी और इमोशनल सपोर्ट न मिलना इसके पीछे हैं। लक्षण: अचानक रोना, बेबसी, खुद को ब्लेम करना, बच्चे से कनेक्ट न होना, गहरी थकान। बचाव: परिवार का मजबूत सपोर्ट, पति की मदद और पर्याप्त आराम। डॉ. गुप्ता सख्ती से कहते हैं, अगर खुद या बच्चे को नुकसान पहुंचाने के विचार आएं, तो फौरन विशेषज्ञ के पास जाएं—ये जानलेवा हो सकता है।

प्रश्न 6: एडजस्टमेंट डिसऑर्डर शादी के बाद नए घर में क्यों होता है, कैसे संभालें?
नई जगह का अचानक बदलाव, जॉइंट फैमिली की परेशानियां या करियर छूटना कारण हैंडॉ. गौरव गुप्ता के मुताबिक। लक्षण: मूड स्विंग्स, चिड़चिड़ापन, सोशल लाइफ से कटना। बचाव: धीरे-धीरे एडजस्ट करें, पार्टनर से बात शेयर करें। अगर खुद के प्रयास नाकाम हों, तो डॉ. गुप्ता काउंसलिंग या थेरेपी की सलाह देते हैं।

प्रश्न 7: घरेलू हिंसा से PTSD कैसे होता है और इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या?
डॉ. गौरव गुप्ता बताते हैं कि शारीरिक, मानसिक, इमोशनल या आर्थिक प्रताड़ना इसके जड़ में है। लक्षण: फ्लैशबैक, ट्रस्ट की कमी, हमेशा असुरक्षा का अहसास, भावनाओं का शून्य होना। बचाव: तुरंत पेशेवर और कानूनी मदद लें। डॉ. गुप्ता जोर देते हैं कि महिला की सुरक्षा पहले—हेल्पलाइन या पुलिस से संपर्क करें।

प्रश्न 8: OCD शादीशुदा महिलाओं में क्यों बढ़ रहा है, इसके लक्षण और उपाय?
परफेक्शनिज्म, फैमिली हिस्ट्री या ट्रॉमेटिक बचपन कारण हैं, जैसा डॉ. गौरव गुप्ता कहते हैं। लक्षण: बार-बार सफाई या चेकिंग, अनचाहे विचार। बचाव: आदतों पर नजर रखें, स्ट्रेस मैनेज करें, हेल्दी लाइफस्टाइल अपनाएं, परिवार की मदद लें। डॉ. गुप्ता बताते हैं कि अगर जीवन प्रभावित हो, तो कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) और दवाएं जरूरी हैं।

प्रश्न 9: स्लीप डिसऑर्डर और बर्नआउट घर-ऑफिस के बोझ से कैसे जुड़े हैं?
घर के कामों का अतिरिक्त भार, डबल जिम्मेदारी, आराम की कमी और सेल्फ-केयर न होना वजहें हैंडॉ. गौरव गुप्ता के अनुसार। लक्षण: लगातार थकान, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, फोकस की कमी। बचाव: पति-परिवार से बात करें, जिम्मेदारियां बांटें, खुद के लिए टाइम निकालें। डॉ. गुप्ता कहते हैं, दो हफ्ते बाद अगर लक्षण बने रहें या पैनिक/मूड स्विंग्स बढ़ें, तो एक्सपर्ट से मिलें।

प्रश्न 10: समय पर मदद न मिले तो क्या गंभीर परिणाम हो सकते हैं?
डॉ. गौरव गुप्ता चेताते हैं कि देरी से जटिलताएं बढ़ती हैं, जो मानसिक, शारीरिक और वैवाहिक जीवन को बर्बाद कर सकती हैं। साइकियाट्रिस्ट को स्थिति संभालना मुश्किल हो जाता है। उनकी सलाह: फिजिकल-मेंटल हेल्थ पर बराबर ध्यान दें, प्रोफेशनल मदद से न हिचकें। डॉ. गुप्ता का मंत्र है—जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार है।

प्रश्न 11: कुल मिलाकर, शादीशुदा महिलाएं इन समस्याओं से कैसे पूरी तरह सुरक्षित रहें?
डॉ. गौरव गुप्ता की विशेष सलाह: खुली बातचीत, सपोर्ट सिस्टम, सेल्फ-केयर और समय पर एक्सपर्ट मदद। भारत जैसे समाज में जहां महिलाओं पर दबाव ज्यादा है, ये कदम जीवन बदल सकते हैं। जागरूक बनें, स्वस्थ रहें!

February 28, 2026

इम्यूनोथेरेपी से कैंसर के खिलाफ मजबूत होती शरीर की रक्षा प्रणाली

इम्यूनोथेरेपी से कैंसर के खिलाफ मजबूत होती शरीर की रक्षा प्रणाली

 रोहतक: पिछले कुछ वर्षों में कैंसर के इलाज के क्षेत्र में काफी बदलाव आया है। इन बदलावों में सबसे महत्वपूर्ण प्रगति इम्यूनोथेरेपी के रूप में सामने आई है। यह ऐसा उपचार है जो शरीर की अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) को कैंसर से लड़ने के लिए मजबूत और सक्रिय बनाता है।


इम्यूनोथेरेपी एक ऐसी थेरेपी है जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कैंसर कोशिकाओं को पहचानने और उन पर हमला करने में मदद करती है। सामान्य रूप से हमारा इम्यून सिस्टम संक्रमण और असामान्य कोशिकाओं से हमारी रक्षा करता है। लेकिन कैंसर कोशिकाएं बहुत चालाक होती हैं और वे अक्सर इम्यून सिस्टम से छिप जाती हैं। इम्यूनोथेरेपी दवाएं इन छिपी हुई कैंसर कोशिकाओं को फिर से पहचानने में मदद करती हैं। इसे सरल शब्दों में समझें तो यह इम्यून सिस्टम पर लगेब्रेकको हटाने जैसा हैजिससे वह कैंसर पर अधिक प्रभावी तरीके से हमला कर सके।


मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल द्वारका के मेडिकल ऑन्कोलॉजी,  विभाग के डायरेक्टर एवं यूनिट हेड डॉ. पियूष बाजपेयी ने बताया “शुरुआत में इम्यूनोथेरेपी का उपयोग मुख्य रूप से एडवांस स्टेज के कैंसर में किया गयाजहां इसके अच्छे परिणाम सामने आए। खासतौर पर फेफड़ों का कैंसरमेलेनोमा (स्किन कैंसर)ब्लैडर कैंसरब्रेस्ट कैंसरहेड एंड नेक कैंसर और कुछ पेट इसोफेगस (फूड पाइप) के कैंसर में इसका लाभ देखा गया। कुछ एडवांस कैंसर मरीजों में इस थेरेपी से कई वर्षों तक बीमारी को कंट्रोल में रखने में मदद मिली है। कुछ विशेष प्रकार के कैंसर में लगभग 15–20 प्रतिशत मरीजों को लंबे समय तक फायदा मिलता है।


डॉ. पियूष ने आगे बताया “अब इम्यूनोथेरेपी का उपयोग सर्जरी से पहले भी किया जाने लगा है। पहले इसे अधिकतर एडवांस बीमारी में दिया जाता थालेकिन अब शोध से यह पता चला है कि जब ट्यूमर शरीर में मौजूद होता हैउसी समय इम्यूनोथेरेपी देने से इम्यून सिस्टम बेहतर प्रतिक्रिया दे सकता है। फेफड़ों का कैंसरमेलेनोमाब्लैडर कैंसरब्रेस्ट कैंसर और गैस्ट्रो-इसोफेगल कैंसर जैसे मामलों में यह तरीका उत्साहजनक परिणाम दिखा रहा है। इससे ट्यूमर को पूरी तरह निकालने की संभावना बढ़ सकती है और कैंसर दोबारा होने का रिस्क कम हो सकता है। हालांकि इम्यूनोथेरेपी हर मरीज पर एक जैसा असर नहीं करती। कुछ मरीजों में बहुत अच्छा रिस्पॉन्स मिलता हैजबकि कुछ में अपेक्षित लाभ नहीं मिलता। कई बार डॉक्टर ट्यूमर या खून में कुछ विशेष मार्कर की जांच करते हैंजिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि इलाज से कितना फायदा होगा। मरीज की अच्छी पोषण स्थिति और सामान्य फिटनेस भी इलाज को सहने और बेहतर परिणाम पाने में मदद करती है।


साइड इफेक्ट्स की बात करें तो इम्यूनोथेरेपी में आमतौर पर कीमोथेरेपी की तुलना में कम बाल झड़ते हैं और कम मतली होती है। लेकिन चूंकि यह इम्यून सिस्टम को सक्रिय करती हैइसलिए कभी-कभी यह शरीर के सामान्य अंगों पर भी असर डाल सकती है। इसके कारण दस्त (लूज मोशन्स)त्वचा पर रैश या खुजलीसांस लेने में तकलीफहार्मोन असंतुलन से थकान या वजन में बदलाव जैसी समस्याएं हो सकती हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि इन लक्षणों की जानकारी समय पर डॉक्टर को दे दी जाए तो अधिकांश साइड इफेक्ट्स का सफल इलाज संभव है।


यदि किसी मरीज को लगातार दस्तसांस फूलना या खांसीअत्यधिक कमजोरी या चक्करतेजी से फैलता हुआ स्किन रैशबुखार या तेज पेट दर्द होतो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। साइड इफेक्ट्स का समय पर उपचार गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है।


मरीजों और उनके परिवारों के लिए यह समझना जरूरी है कि इम्यूनोथेरेपी कोई जादू नहीं हैलेकिन यह कैंसर उपचार में एक बड़ी मेडिकल प्रगति जरूर है। इसने कई प्रकार के कैंसर में मरीजों की जीवन अवधि और जीवन की गुणवत्ता दोनों में सुधार किया है। सही मरीज का चयननियमित मॉनिटरिंग और समय पर सलाह के साथ इम्यूनोथेरेपी आज कैंसर देखभाल में नई उम्मीद लेकर आई है।