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पलवल: पीठ दर्द एक आम समस्या है जो किसी भी उम्र
में किसी को भी हो सकती है। आज लगभग हर व्यक्ति अपने जीवनकाल में किसी न किसी समय
पीठ दर्द का अनुभव करता है, लेकिन राहत की बात यह है कि लगभग 95% मामलों में यह दर्द बिना सर्जरी के ही जीवनशैली में बदलाव, दवाओं, फिजियोथेरेपी और अन्य नॉन-सर्जिकल थेरेपी
से ठीक किया जा सकता है। केवल 5% मामलों में गंभीर दर्द या इलाज का असर न
होने पर सर्जरी की आवश्यकता होती है।
पीठ दर्द से बचाव ही इसका सबसे अच्छा इलाज है। उम्र के साथ रीढ़
की हड्डी के जोड़ों, डिस्क और हड्डियों में होने वाले बदलाव
(डिजेनेरेटिव स्पाइन डिजीज) से होने वाले पुराने पीठ दर्द को स्वस्थ जीवनशैली
अपनाकर काफी हद तक रोका या धीमा किया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि व्यक्ति
अपना वजन नियंत्रित रखे, रोजाना एक्सरसाइज करे, सही पॉश्चर अपनाए और धूम्रपान से दूर रहे। यह सब रीढ़ की
मांसपेशियों को मजबूत बनाने और लंबे समय तक स्पाइनल हेल्थ बनाए रखने में सहायक
होता है।
मैक्स स्मार्ट सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेतकेन्यूरोसर्जरीविभाग केएसोसिएट डायरेक्टरएंड यूनिट हेडडॉ. कपिल जैन ने बताया कि “हालांकि, कुछ संकेतों को नजरअंदाज नहीं किया जाना
चाहिए। अगर किसी को लगातार बढ़ता हुआ पीठ दर्द हो, आराम करने पर भी राहत न मिले, पैरों या हाथों में सुन्नता, कमजोरी या झनझनाहट हो, बुखार या पाचन/मूत्र संबंधी लक्षणों के
साथ दर्द हो, या कैंसर के इतिहास वाले मरीजों को पीठ
में दर्द हो, तो तुरंत न्यूरोसर्जन या स्पाइन
स्पेशलिस्ट से संपर्क करना चाहिए। ये संकेत किसी गंभीर रोग की ओर इशारा कर सकते
हैं। पीठ दर्द के सही कारणों का पता लगाने के लिए आमतौर पर एमआरआई सबसे उपयुक्त
जांच होती है, जिससे हर्नियेटेड डिस्क, स्पाइनल स्टेनोसिस, संक्रमण, ट्यूमर या अन्य डिजेनेरेटिव बदलावों का पता चल सकता है। इसके आधार पर डॉक्टर
दवाएं, फिजियोथेरेपी, आराम और जीवनशैली में बदलाव जैसे
कंजरवेटिव ट्रीटमेंट शुरू करते हैं और अधिकांश मरीज कुछ ही हफ्तों में बेहतर महसूस
करते हैं।“
अगर इलाज के बावजूद लक्षण बने रहें या बढ़ जाएं, तो फिर सर्जरी की सलाह दी जाती है। आजकल माइक्रोस्कोपिक और
एंडोस्कोपिक स्पाइन सर्जरी जैसे आधुनिक और मिनिमली इनवेसिव विकल्प मौजूद हैं, जिनमें छोटा चीरा, कम मांसपेशियों की क्षति और जल्दी ठीक
होने की संभावना होती है। ये सर्जरी सामान्यत: रीजनल या लोकल एनेस्थीसिया के तहत
की जाती हैं और कुशल सर्जनों द्वारा बेहतरीन परिणाम मिलते हैं।
पीठ दर्द आम जरूर है, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
विशेष संकेतों की स्थिति में तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लें, क्योंकि समय रहते इलाज से दर्द रहित और स्वस्थ जीवन संभव है।
एंडोवैस्कुलर तकनीक से ब्रेन एन्यूरिज़्म का इलाज अब पहले से ज्यादा सुरक्षित
बरेली: एन्यूरिज़्म ब्लड वेसल्स की दीवारों में बनने वाला असामान्य उभार या फुलाव होता है, जो अधिकतर आर्टरीज़ में देखा जाता है। यह शरीर के विभिन्न हिस्सों में हो सकता है, जैसे दिमाग, एओर्टा या पेरिफेरल आर्टरीज़ में। कई बार एन्यूरिज़्म छोटे रहते हैं और कोई लक्षण नहीं देते, लेकिन कुछ मामलों में यह धीरे-धीरे बढ़ते हैं और फटने पर जानलेवा स्थिति पैदा कर सकते हैं। जब एन्यूरिज़्म दिमाग की ब्लड वेसल्स में होता है, तो उसे सेरेब्रल एन्यूरिज़्म कहा जाता है। इसके फटने से सबएरैक्नॉइड हैमरेज हो सकता है, जो समय पर इलाज न होने पर गंभीर कॉम्प्लीकेशन्स और मृत्यु का कारण बन सकता है।
परंपरागत रूप से ब्रेन एन्यूरिज़्म का इलाज ओपन सर्जरी से किया जाता था, जिसमें न्यूरोसर्जन को क्रैनियोटॉमी करके सीधे प्रभावित ब्लड वेसल्स तक पहुंचना पड़ता था और एन्यूरिज़्म के बेस पर क्लिप लगाई जाती थी। यह तरीका प्रभावी जरूर था, लेकिन काफी इनवेसिव होने के कारण इसमें रिकवरी का समय ज्यादा लगता था और खासकर बुजुर्ग मरीजों या अन्य बीमारियों से ग्रस्त मरीजों में जोखिम भी अधिक रहता था।
मेदांता सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, नोएडा केन्यूरोइंटरवेंशन एवं स्ट्रोक विभाग केडायरेक्टरडॉ. गिरिश राजपाल ने बताया कि“आज के समय में एंडोवैस्कुलर थेरेपी ब्रेन एन्यूरिज़्म के इलाज के लिए एक मिनिमली इनवेसिव और अत्यंत प्रभावी विकल्प के रूप में उभरी है। इस तकनीक में ओपन सर्जरी की जरूरत नहीं होती, बल्कि ग्रोइन या कलाई में एक छोटे से पंक्चर के जरिए ब्लड वेसल्स के भीतर से ही एन्यूरिज़्म तक पहुंचा जाता है। डिजिटल सब्ट्रैक्शन एंजियोग्राफी जैसी एडवांस इमेजिंग तकनीकों की मदद से माइक्रोकैथेटर को बेहद सटीक तरीके से दिमाग की ब्लड वेसल्स के भीतर आगे बढ़ाया जाता है। एन्यूरिज़्म तक पहुंचने के बाद उसका इलाज विभिन्न आधुनिक तरीकों से किया जाता है। कॉइलिंग तकनीक में प्लैटिनम की बेहद पतली कॉइल्स को एन्यूरिज़्म के अंदर डाला जाता है, जिससे वहां ब्लड क्लॉट बन जाता है और एन्यूरिज़्म में ब्लड फ्लो रुक जाता है। वहीं फ्लो डाइवर्टर जैसे स्टेंट-लाइक डिवाइस एन्यूरिज़्म की गर्दन पर लगाए जाते हैं, जिससे खून का बहाव उभार से हटकर सामान्य ब्लड वेसल्स की ओर मुड़ जाता है और समय के साथ एन्यूरिज़्म खुद ही बंद होने लगता है।“
डॉ. गिरिश ने आगे बताया कि“एंडोवैस्कुलर थेरेपी के कई महत्वपूर्ण फायदे हैं। यह मिनिमली इनवेसिव होने के कारण मरीज को कम दर्द, कम ब्लड लॉस और कम समय में अस्पताल से छुट्टी मिलने का लाभ देती है। रिकवरी तेजी से होती है और रोजमर्रा की जिंदगी में वापसी भी जल्दी संभव होती है। जो मरीज ओपन सर्जरी के लिए हाई रिस्क माने जाते हैं, उनके लिए यह तकनीक कहीं अधिक सुरक्षित विकल्प साबित होती है। आधुनिक इमेजिंग और नेविगेशन सिस्टम की मदद से डिवाइस की सटीक प्लेसमेंट संभव होती है, जिससे इलाज की सफलता दर भी बेहतर होती है और कॉम्प्लिकेशन का खतरा कम होता है।“
हालांकि, किसी भी मेडिकल प्रोसीजर की तरह एंडोवैस्कुलर इलाज में भी कुछ जोखिम हो सकते हैं, जैसे पंक्चर साइट पर ब्लीडिंग, ब्लड वेसल्स को नुकसान या क्लॉट बनने की संभावना। कुछ मामलों में एन्यूरिज़्म दोबारा उभर सकता है, जिसके लिए फॉलो-अप इमेजिंग और कभी-कभी दोबारा इलाज की जरूरत पड़ती है। लेकिन अनुभवी विशेषज्ञों और अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ इन जोखिमों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, एंडोवैस्कुलर थेरेपी ने ब्रेन एन्यूरिज़्म के इलाज की दिशा ही बदल दी है। यह मरीजों को एक ऐसा लाइफ-सेविंग विकल्प देती है, जिसमें प्रिसिशन, सेफ्टी और तेज रिकवरी का बेहतरीन संतुलन होता है। एन्यूरिज़्म के प्रति जागरूकता, समय पर जांच और सही समय पर इलाज मरीज की जान बचाने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। लगातार विकसित हो रही डिवाइस टेक्नोलॉजी और तकनीकों के साथ भविष्य में एन्यूरिज़्म का इलाज पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनता जा रहा है।
गुवाहाटी:मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत ने जॉइंट रिप्लेसमेंट के क्षेत्र में एक नया बेंचमार्क
स्थापित करते हुए अपने डे-केयर रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट प्रोग्राम की सफल शुरुआत
की है। लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने, सर्जरी के बाद होने वाले दर्द और देर से
रिकवरी जैसी पुरानी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया यह एडवांस
प्रोग्राम योग्य मरीजों को रोबोटिक आर्म-असिस्टेड नी रिप्लेसमेंट सर्जरी के बाद
उसी दिन घर लौटने की सुविधा देता है। यह पहल भारत में जॉइंट रिप्लेसमेंट के इलाज
के तरीके में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाती है।
आर्थराइटिस या जॉइंट डीजेनेरेशन के कारण होने वाला क्रॉनिक
घुटनों का दर्द अक्सर चलने-फिरने की क्षमता को सीमित कर देता है और जीवन की
गुणवत्ता पर असर डालता है। चलना, सीढ़ियां चढ़ना या घर के सामान्य काम भी
कठिन हो जाते हैं। हालांकि पारंपरिक नी रिप्लेसमेंट सर्जरी प्रभावी रही है, लेकिन लंबी रिकवरी और अस्पताल में रुकने की आशंका के कारण कई
मरीज हिचकिचाते हैं। डे-केयर रोबोटिक अप्रोच एडवांस टेक्नोलॉजी को पेशेंट-सेंट्रिक
प्रोटोकॉल के साथ जोड़ती है, जिससे ज्यादा प्रिसिशन, मिनिमल इनवेसिव सर्जरी और तेज रिहैबिलिटेशन संभव हो पाता है।
इससे मरीज कम समय में ज्यादा आत्मविश्वास के साथ अपनी मोबिलिटी वापस पा सकते हैं।
मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, साकेत में रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट विभाग के चेयरमैन डॉ.
सुजॉयभट्टाचार्जीने कहा, “रोबोटिक आर्म-असिस्टेड सिस्टम एडवांस 3डी इमेजिंग के जरिए हर मरीज के घुटने की बनावट के अनुसार एक
पर्सनलाइज्ड सर्जिकल प्लान तैयार करता है। सर्जरी के दौरान रोबोटिक आर्म इस प्लान
को बेहद सटीकता के साथ लागू करता है, जिससे सही अलाइनमेंट और बैलेंस सुनिश्चित
होता है और नेचुरल स्ट्रक्चर सुरक्षित रहते हैं। पोस्टेरियर क्रूशिएट लिगामेंट को
सुरक्षित रखना, सबवास्टस अप्रोच के जरिए मसल कटिंग से
बचना और टॉर्निकेट का इस्तेमाल न करना जैसे अहम सर्जिकल सिद्धांत घुटने को अधिक
नेचुरल फील देने में मदद करते हैं, साथ ही ब्लड लॉस और सर्जरी के बाद होने
वाली तकलीफ भी कम होती है। रोबोटिक सर्जरी के मिनिमली इनवेसिव नेचर के कारण मरीजों
को कम दर्द होता है और रिकवरी तेज होती है। लोकल एनेस्थीसिया का असर खत्म होते ही
कुछ ही घंटों में रिहैबिलिटेशन शुरू कर दी जाती है, जिसमें पहले असिस्टेड मूवमेंट और कई मामलों में स्वतंत्र रूप से चलना भी
शामिल है।”
मेरठ, दिसंबर
18, 2025: मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली
ने आज मैक्स मेडसेंटर, मेरठ में अपनी एक्सक्लूसिव न्यूरोलॉजी ओपीडी सेवाओं की शुरुआत
की। इस ओपीडी का शुभारंभ मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली, के न्यूरोलॉजी विभाग
के प्रिंसिपल कंसल्टेंट डॉ- मधुकर त्रिवेदी,
की मौजूदगी में किया गया।
डॉ. मधुकर
त्रिवेदी, अब मैक्स मेडसेंटर, मेरठ में हर
महीने के पहले और तीसरे बुधवार को दोपहर 12:00 बजे से 2:00 बजे तक उपलब्ध रहेंगे, जहां
वे प्राइमरी कंसल्टेशन और फॉलो-अप सेवाएं प्रदान करेंगे।
लॉन्च के
दौरान, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रिंसिपल कंसल्टेंट
- डॉ. मधुकर त्रिवेदी, ने बताया कि, “बड़ी संख्या में मरीज सिरदर्द, माइग्रेन, अचानक
या तीव्र चक्कर आना, बेहोशी, चलने में परेशानी, संतुलन या कोऑर्डिनेशन की कमी, हाथ-पैरों
में सुन्नपन, एक या दोनों आंखों से देखने में दिक्कत, बोलने में समस्या, निगलने में
कठिनाई जैसी न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के साथ आते हैं। इन ओपीडी सेवाओं की शुरुआत से मेरठ
और आसपास के क्षेत्रों के लोगों को स्ट्रोक मैनेजमेंट, एपिलेप्सी सहित विभिन्न न्यूरोलॉजिकल
डिसऑर्डर्स के डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट की सुविधा आसानी से मिल सकेगी।
डॉ. मधुकर,
ने आगे कहा कि, “स्ट्रोक एक मेडिकल इमरजेंसी है, जिसमें तुरंत इलाज बेहद जरूरी होता
है। खासकर इस्केमिक स्ट्रोक के मामलों में गोल्डन आवर के भीतर सही हस्तक्षेप से ब्रेन
डैमेज को काफी हद तक कम किया जा सकता है। समय पर क्लॉट-डिज़ॉल्विंग दवाएं या क्लॉट
रिमूवल प्रोसीजर, साथ ही थ्रोम्बोलाइटिक थेरेपी, एंटीकोएगुलेंट्स, एंटीप्लेटलेट मेडिकेशन
और ब्लड प्रेशर कंट्रोल जैसे मेडिकल मैनेजमेंट से बेहतर परिणाम मिलते हैं। इसी तरह,
एपिलेप्सी भी एक आम न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें अर्ली डायग्नोसिस और नियमित इलाज
से सीज़र्स को कंट्रोल किया जा सकता है और मरीज की क्वालिटी ऑफ लाइफ में बड़ा सुधार
संभव है। आधुनिक दवाओं और सर्जिकल इंटरवेंशंस की मदद से मूवमेंट डिसऑर्डर्स को भी प्रभावी
ढंग से मैनेज किया जा रहा है।“
आधुनिक टेक्नोलॉजी,
स्पेशलाइज्ड क्लिनिकल अप्रोच, बेहतरीन डायग्नोस्टिक सुविधाओं और मल्टी-डिसिप्लिनरी
टीम के साथ मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, वैशाली, एक 24×7 स्ट्रोक इमरजेंसी रेडी
सेंटर के रूप में सेवाएं प्रदान कर रहा है।
जेईई, नीट, बोर्ड्स और ओलिंपियाड की तैयारी के लिए
देश के सबसे विश्वसनीय संस्थानों में से एक विद्यामंदिर क्लासेज़ (वीएमसी) ने
विद्यामंदिर इंटेलेक्ट नेशनल इंसेंटिव टेस्ट (VINIT) की घोषणा की है। यह वीएमसी का प्रमुख एडमिशन-कम-स्कॉलरशिप-कम-इंसेंटिव टेस्ट
है, जो कक्षा 5 से 12 तक के छात्रों के लिए आयोजित किया जाता
है। इस वर्ष VINIT पहले से और बड़ा होकर लौट रहा है—ज़्यादा
कैश रिवॉर्ड्स, बेहतर स्कॉलरशिप और अधिक अकैडमिक
बेनिफिट्स के साथ।
यह टेस्ट पूरे देश में 21 और 25 दिसंबर को आयोजित होगा, जिसमें छात्रों को कुल तीन अवसर मिलेंगे। VINIT छात्रों को साइंस और मैथ्स में अपनी कॉन्सेप्चुअल अंडरस्टैंडिंग
जांचने, लर्निंग गैप्स पहचानने और वीएमसी के
एडवांस्ड एनालिटिकल टूल्स के साथ नेशनल लेवल पर अपना परफॉर्मेंस बेंचमार्क करने
में मदद करता है।
VINIT के तहत मेरिटोरियस छात्रों को 2.5 करोड़ रुपये तक के मेगा कैश प्राइज़, 100% तक की स्कॉलरशिप, और कई एक्सक्लूसिव अकैडमिक फायदे मिलेंगे, जैसे मौजूदा सत्र के लिए रिविज़न क्लासेज़, साइंटिफिकली डिज़ाइन किए गए प्रैक्टिस टेस्ट, मॉक बोर्ड एग्ज़ाम और विस्तृत ई-स्टडी मटेरियल। सभी क्वालिफ़ाई
करने वाले छात्रों को वीएमसी के नेशनल स्तर पर प्रसिद्ध फैकल्टी और फाउंडिंग टीम
के एक्सक्लूसिव सेशंस व मेंटरशिप का लाभ मिलेगा। इसके अलावा छात्र वीएमसी के
क्लासरूम या ऑनलाइन प्रोग्राम्स में एडमिशन लेकर जेईई, नीट, ओलिंपियाड और बोर्ड परीक्षाओं की
दीर्घकालीन तैयारी भी मजबूत कर सकते हैं।
इस पहल पर बोलते हुए वीएमसी के को-फाउंडर (आई आई टी - दिल्ली -
अलुम्नी) संदीप मेहता ने कहा, “विद्यामंदिर का मिशन हमेशा से छात्रों में
साइंटिफिक और एनालिटिकल थिंकिंग की मजबूत नींव बनाना रहा है। VINIT, छात्रों को शुरू से ही हाई-क्वालिटी असेसमेंट का अनुभव देता है, जिससे वे कॉम्पिटीटिव एग्ज़ाम्स के बढ़ते कठिनाई स्तर के साथ
आसानी से एडजस्ट कर सकें। हम टैलेंट को पहचानकर बड़े इंसेंटिव और स्कॉलरशिप देते
हुए देश के भावी इंजीनियर, डॉक्टर और इनोवेटर्स तैयार करना चाहते
हैं।”
लगभग चार दशकों से वीएमसी ने पूरे देश में, अपने फाउंडर्स की वैल्यू-ड्रिवन टीचिंग और पर्सनल मेंटरशिप के
साथ, लाखों छात्रों की अकैडमिक यात्रा को दिशा दी है । VINIT इसी विरासत को आगे बढ़ाता है, कक्षा 5 से 12 तक के छात्रों को अर्ली स्टार्ट एडवांटेज
देते हुए—ताकि वे मजबूत फ़ंडामेंटल बनाएं और ओलिंपियाड, बोर्ड्स तथा भविष्य की JEE/NEET तैयारी के लिए अच्छी बुनियाद विकसित कर
सकें।
वीएमसी के को-फाउंडर (आई आई टी - दिल्ली - अलुम्नी) मनमोहन
गुप्ताने कहा, “हर स्टेज पर छात्र की लर्निंग कर्व को समझना हमारी मेथडोलॉजी का मूल है।
हमारी एक्सपीरियंस्ड फैकल्टी—जो एक दशक से अधिक समय से JEE और NEET छात्रों को ट्रेन कर रही है—यह सुनिश्चित
करती है कि हर छात्र को सही गाइडेंस, क्लैरिटी और मेंटरशिप मिले, ताकि वह नेशनल और इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर उत्कृष्ट प्रदर्शन कर
सके।”
VINIT केवल इंजीनियरिंग या मेडिकल आकांक्षी छात्रों के लिए ही नहीं
है—यह उन सभी छात्रों के लिए समान रूप से फायदेमंद है जो स्कूल-लेवल और नेशनल-लेवल
ओलिंपियाड में उत्कृष्टता प्राप्त करना चाहते हैं, या कक्षा 10 और 12 बोर्ड परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन की
तैयारी कर रहे हैं। इसका स्ट्रक्चर्ड इवैल्यूएशन और फीडबैक सिस्टम छात्रों को यह
स्पष्ट रूप से बताता है कि वे कहां खड़े हैं और कैसे लगातार सुधार कर सकते हैं।
VINIT 2025 के बारे में रजिस्ट्रेशन, टेस्ट डेट्स, रिवॉर्ड्स, सिलेबस और सैंपल पेपर्स जानने के इच्छुक
छात्रhttps://www.vidyamandir.com/पर विज़िट कर सकते हैं।
Agra, December 12,
2025: Doctors
at Max Super Speciality Hospital, Saket have successfully performed a
life-saving Haploidentical Bone Marrow Transplant (BMT) on a 21-year-old
patient from Agra diagnosed with Acute Myeloid Leukaemia (AML), battling
high-risk blood cancer. The complex procedure was led by Dr. Faran Naim, Senior
Consultant - Hematology & Bone Marrow Transplantation and Dr. Rayaz
Ahmed, Principal Director - Haematology and Bone Marrow Transplant from Max
Super Speciality Hospital, Saket
The patient, Mr. Manan
Sharma, a 21-year-old student, first presented in June 2025 with a short
history of persistent fever and severe fatigue. Preliminary evaluation in Agra
indicated a high suspicion of leukemia, prompting an immediate referral to Max Hospital,
Saket. Upon comprehensive testing done at Max Hospital Saket, he was diagnosed
with Acute Myeloid Leukaemia, an aggressive form of blood cancer that requires
prompt and intensive treatment.
Mr. Sharma was admitted
and placed on immediate supportive care, including antibiotics for persistent
fever. The medical team counselled the family regarding the need for intensive
chemotherapy, following which he underwent induction chemotherapy with the
FLAG-VEN regimen. While he responded positively to treatment, he encountered a
serious infectious complication known as Ludwig’s angina. With appropriate
medical management, he made a full recovery.
Dr. Faran Naim, Senior
Consultant - Hematology & Bone Marrow Transplantation, Max Super Speciality
Hospital, Saket said “Performing a haploidentical transplant requires
meticulous planning and careful management of post-transplant complications.
Manan responded exceptionally well at every stage of treatment. Seeing him
return to a normal life after six months is extremely rewarding. This success
highlights the capability of our team and the advanced BMT infrastructure at
Max Hospital, Saket.”
A repeat evaluation
revealed that the disease had entered remission. However, due to the presence
of high-risk genetic mutations, the treating team advised an allogeneic Bone
Marrow Transplant as the best long-term curative approach. Being the only child,
Manan did not have a matched sibling donor, making a fully matched transplant
impossible. The family was counselled for a haploidentical (half-matched)
transplant using his father as the donor.
Dr. Rayaz Ahmed,
Principal Director - Haematology and Bone Marrow Transplant from Max Super
Speciality Hospital, Saket said / or Dr Faran further added “Manan’s case
reflects how modern advancements in bone marrow transplantation are giving
young patients a second chance at life, even in the absence of fully matched
donors. Haploidentical BMTs allow us to extend curative therapy to families who
otherwise struggle to find a compatible donor. His recovery is a testament to
timely diagnosis, coordinated multidisciplinary care, and the unwavering
strength of the patient and his family.”
Manan underwent a
successful haploidentical BMT at Max Hospital, Saket. The procedure demanded
advanced clinical precision, expert infection control, and continuous
monitoring. Today, six months post-transplant, Manan is leading a normal life,
requires no major medications, and is steadily returning to his routine
activities. His recovery demonstrates how haploidentical transplants are
transforming outcomes for high-risk patients, especially when fully matched
donors are unavailable.
Max Hospital, Saket
continues to be a leading centre for advanced haematology and bone marrow
transplantation, offering cutting-edge treatments that provide renewed hope for
patients with complex blood cancers.
About Max Healthcare:
Max Healthcare Institute Limited (Max Healthcare) is one of
India’s largest healthcare organizations. It is committed to the highest
standards of clinical excellence and patient care, supported by latest
technology and cutting-edge research.
Max Healthcare operates 20 healthcare facilities (~5,200
beds) with a significant presence in North India. The network consists of all
the hospitals and medical centres owned and operated by the Company and its
subsidiaries, partner healthcare facilities and managed healthcare facilities,
which includes state-of-the-art tertiary and quaternary care hospitals located
at Saket (3 hospitals), Patparganj, Vaishali, Rajendra Place, Dwarka, Noida and
Shalimar Bagh in Delhi NCR and one each in Lucknow, Mumbai, Nagpur, Mohali,
Bathinda, Dehradun, secondary care hospitals in Gurgaon and medical centres at
Noida, Lajpat Nagar and Panchsheel Park in Delhi NCR, and one in Mohali,
Punjab. The hospitals in Mohali and Bathinda are under PPP arrangement with the
Government of Punjab.
In addition to the hospitals, Max Healthcare operates
homecare and pathology businesses under brand names Max@Home and Max Lab,
respectively. Max@Home offers health and wellness services at home while Max
Lab provides diagnostic services to patients outside the network.
मुरादाबाद : भारत की प्रमुख सुपर-स्पेशलिटी आई हॉस्पिटल चेन सेंटर फॉर साइट ने मुरादाबाद में अपनी एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत की है। वेस्टर्न यूपी के लोगों को वर्ल्ड-क्लास रेटिना ट्रीटमेंट उपलब्ध कराने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। इस उपलब्धि को और खास बनाते हुए जानी-मानी विट्रियोरेटिनल सर्जन डॉ. उपासना सिंह सीनियर कंसल्टेंट – विट्रियोरेटिनल सर्विसेज के रूप में टीम में शामिल हुई हैं।
1996 में पद्मश्री प्रो. (डॉ.) महिपाल एस. सचदेव द्वारा स्थापित सेंटर फॉर साइट आज देश के सबसे विश्वसनीय आई-केयर नेटवर्क्स में से एक है, जिसके 90+ सेंटर्स, 30+ शहरों में प्रज़ेंस, 350+ विशेषज्ञ डॉक्टर और लगभग तीन दशक की क्लीनिकल एक्सीलेंस शामिल है। हर साल 15 लाख से ज़्यादा मरीज यहां मोतियाबिंद, रिफ्रैक्टिव सर्जरी, कॉर्निया, ग्लॉकोमा, रेटिना, पीडियाट्रिक ऑप्थैल्मोलॉजी, ओकुलोप्लास्टी और ऑक्युलर ऑन्कोलॉजी जैसी सेवाओं का लाभ उठाते हैं।
मुरादाबाद स्थित सेंटर फॉर साइट में शुरू हुई नई सर्जिकल रेटिना यूनिट डायबेटिक रेटिनोपैथी, रेटिनल डिटैचमेंट, एआरएमडी (ARMD), मैक्युलर होल, एपिरेटिनल मेम्ब्रेन और एडवांस्ड विट्रियोरेटिनल डिज़ीज़ जैसी कॉम्प्लेक्स स्थितियों की डायग्नोसिस व मैनेजमेंट के लिए पूरी तरह सक्षम है। नेक्स्ट-जेन डायग्नोस्टिक्स और कटिंग-एज सर्जिकल टेक्नोलॉजी के साथ अब मरीजों को स्पेशलाइज्ड रेटिना ट्रीटमेंट के लिए बड़े शहरों की यात्रा नहीं करनी पड़ेगी।
सेंटर फॉर साइट मुरादाबाद की नई टीम में शामिल हो रही हैं डॉ. उपासना सिंह, जो अपनी मज़बूत अकादमिक पृष्ठभूमि, सर्जिकल स्किल्स और पेशेंट सेंट्रिक अप्रोच के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने MBBS गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज मिरज (MUHS) से किया और MS ऑप्थैल्मोलॉजी एमएलएन मेडिकल कॉलेज, प्रयागराज (KGMU) से। इसके बाद उन्होंने सतगुरु नेत्र चिकित्सालय, चित्रकूट से विट्रियोरेटिनल सर्जरी में फेलोशिप पूरी की—जो भारत के सबसे प्रतिष्ठित रेटिना संस्थानों में से एक है। सेंटर फॉर साइट से जुड़ने से पहले वे ASMC प्रतापगढ़ में असिस्टेंट प्रोफेसर थीं और क्लीनिकल व सर्जिकल ट्रेनिंग में उल्लेखनीय योगदान दे चुकी हैं।
लॉन्च के अवसर पर डॉ. उपासना सिंह ने कहा, “कई रेटिनल बीमारियाँ धीरे-धीरे बढ़ती हैं और समय रहते इलाज न मिले तो परमानेंट विज़न लॉस का कारण बन सकती हैं। मुरादाबाद में सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत से अब मरीजों को एडवांस्ड डायग्नोस्टिक्स और स्पेशलाइज्ड सर्जरी अपने ही शहर में उपलब्ध होगी। सेंटर फॉर साइट से जुड़कर मैं सम्मानित महसूस कर रही हूँ और लोगों की सेवा संवेदना, सटीकता और लेटेस्ट सर्जिकल इनोवेशन के साथ करने के लिए तत्पर हूँ।”
सेंटर फॉर साइट ग्रुप ऑफ़ आई हॉस्पिटल्स के चेयरमैन और मेडिकल डायरेक्टर, प्रो. (डॉ.) महिपाल एस. सचदेव ने कहा, “सेंटर फॉर साइट का लक्ष्य हमेशा से उच्च-गुणवत्ता, नैतिक और सुलभ आंखों की देखभाल उपलब्ध कराना रहा है। मुरादाबाद में सर्जिकल रेटिना सर्विसेज की शुरुआत, जिसका नेतृत्व डॉ. उपासना सिंह कर रही हैं, हमारी इसी प्रतिबद्धता को मज़बूत करती है। इससे हम उन क्षेत्रों तक भी वर्ल्ड-क्लास एक्सपर्टीज़ और टेक्नोलॉजी पहुँचा पा रहे हैं जहाँ इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है।”
सेंटर फॉर साइट मुरादाबाद के मेडिकल डायरेक्टर, डॉ. ललित मोहन ने कहा, “मुरादाबाद के आई-केयर में यह एक महत्वपूर्ण माइलस्टोन है। एडवांस्ड सर्जिकल रेटिना सर्विसेज और डॉ. उपासना सिंह की विशेषज्ञता के साथ अब जटिल रेटिनल बीमारियों से जूझ रहे मरीज समय पर और स्पेशलाइज्ड ट्रीटमेंट हमारे ही शहर में प्राप्त कर सकेंगे। यह पहल हमारी कमिटमेंट को और मजबूत करती है—हर मरीज को करुणा, व्यापक देखभाल और हाई-टेक उपचार प्रदान करना।”
इस नए विकास के साथ, सेंटर फॉर साइट पूरे भारत में एडवांस्ड, नैतिक और उच्च-गुणवत्ता वाली आई-केयर सेवाएँ प्रदान करने के अपने संकल्प को फिर से दोहराता है।
मिर्गी के दौरे पड़ना गंभीर बीमारी है, लेकिन बिना लापरवाही के डॉक्टर से सही समय पर इलाज मिल जाए तो
इससे जिंदगी को नॉर्मल किया जा सकता है। डॉक्टर ने बताया मिर्गी के दौरे पड़ने के
क्या कारण हैं?
मिर्गी (Epilepsy) एक न्यूरोलॉजिकल विकार है, जिसमें मस्तिष्क के अंदर असामान्य विद्युत गतिविधि होती है।
भारत में लाखों लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं और समय रहते जागरूकता और सही इलाज
के जरिए इसे कंट्रोल किया जा सकता है। मिर्गी का सीधा कनेक्शन हमारे मस्तिष्क (Brain) से होता है। मिर्गी के दौरे पड़ने के अलग-अलग लोगों में कुछ इस
तरह के कारण हो सकते हैं।डॉक्टर आदित्य गुप्ता (डायरेक्टर, न्यूरोसर्जरी एंड साइबरनाइफ, आर्टेमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम) ने बताया कि मिर्गी कई कारणों से हो सकती है, लेकिन इसके मुख्य कारण इनमें से कोई हो सकते हैं।
मिर्गी के दौरे क्यों पड़ते हैं?
मस्तिष्क में चोट (Brain Injury)- किसी को सड़क दुर्घटना, गिरने या सिर पर चोट लगने के बाद मस्तिष्क
की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं, जो बाद में दौरे का कारण बनती हैं।
स्ट्रोक (Stroke)- स्ट्रोक के बाद
मस्तिष्क के प्रभावित हिस्से में असंतुलित विद्युत गतिविधि विकसित हो जाती है, जिससे मिर्गी होने की संभावना बढ़ जाती है।
दिमाग में ट्यूमर या इंफेक्शन (Brain Tumor Or
Infection)- ब्रेन ट्यूमर, मैनिन्जाइटिस, एन्सेफलाइटिस जैसे संक्रमण दिमाग की
संरचना को प्रभावित करते हैं और मिर्गी के दौरे की स्थिति पैदा कर सकते हैं।
जन्मजात कारण (Genetic/Early Developmental Issues)- कुछ बच्चों में मस्तिष्क का विकास गर्भावस्था या जन्म के दौरान
प्रभावित हो जाता है, जिससे बचपन में मिर्गी के लक्षण दिख सकते
हैं।
आनुवंशिक कारण (Genetic)- कुछ प्रकार की
मिर्गी परिवार में चलती है और जीन संबंधी बदलावों के कारण होती है।
इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन / मेटाबॉलिक कारण-लो शुगर, हाई या लो सोडियम, किडनी/लिवर की गंभीर समस्याएं भी दौरे ट्रिगर कर सकती हैं।
क्या मिर्गी का इलाज संभव है?
डॉक्टर आदित्य गुप्ता बताते हैं कि मिर्गी का आधुनिक उपचार बेहद
प्रभावी है। दवाइयों से 70% मरीज पूरी तरह कंट्र्रोल किया जा सकता है।
जिन पर दवाइयां असर नहीं करतीं, उनमें एडवांस्ड ब्रेन सर्जरी, लेज़र एब्लेशन या साइबरनाइफ तकनीक बेहतरीन परिणाम दे सकती है।
समय पर पता लगना और लगातार फॉलो-अप मरीज के स्वस्थ रहने के लिए बहुत जरूरी हैं।
मिर्गी एक ऐसी बीमारी है जिसे सही जानकारी, समय पर उपचार और परिवार के सहयोग से पूरी
तरह सामान्य जीवन में बदला जा सकता है।
फरीदाबाद : यथार्थ सुपर
स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, सेक्टर 88, फरीदाबाद के डॉक्टरों ने एक बार फिर उन्नत कार्डियक
केयर में अपनी विशेषज्ञता साबित की है। हॉस्पिटल की टीम ने दो बुजुर्ग मरीजों का जीवन-रक्षक
उपचार ट्रांसकैथेटर एओर्टिक वाल्व इम्प्लांटेशन (TAVI) तकनीक से किया, जिससे उनकी ज़िंदगी
में नई उम्मीदें लौट आईं।
पहले
मामले में 90 वर्षीय महिला गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस और कई अन्य बीमारियों से जूझ रही
थीं। लगातार सांस फूलना, सीने में दर्द और हड्डी टूटने जैसी गंभीर परिस्थितियों में
उन्हें हॉस्पिटल लाया गया। उनकी उम्र और कमजोर स्वास्थ्य को देखते हुए ओपन-हार्ट सर्जरी
संभव नहीं थी। हॉस्पिटल की मल्टीडिसिप्लिनरी हार्ट टीम ने TAVI प्रक्रिया को चुना और
जटिल एओर्टिक एन्यूलस के लिए सेल्फ-एक्सपैंडेबल वाल्व का उपयोग किया। कुछ ही दिनों
में उनकी सांस लेने की तकलीफ दूर हो गई और दो महीने के भीतर वे सामान्य जीवन जीने लगीं।
दूसरे
मामले में 79 वर्षीय पुरुष मरीज, जिनकी 10 साल पहले ओपन-हार्ट वाल्व रिप्लेसमेंट सर्जरी
हुई थी, गंभीर हार्ट फेलियर के लक्षणों के साथ हॉस्पिटल आए। जांच में उनका बायोप्रोस्थेटिक
वाल्व फेल पाया गया। दोबारा ओपन-हार्ट सर्जरी जोखिम भरी थी, इसलिए डॉक्टरों ने वाल्व-इन-वाल्व
TAVI प्रक्रिया को चुना। इसमें पुराना वाल्व फ्रैक्चर कर नया बैलून-एक्सपैंडेबल मायवाल
(Meril) वाल्व लगाया गया। मरीज बिना किसी जटिलता के स्वस्थ होकर डिस्चार्ज हुए और कुछ
ही सप्ताह में सामान्य दिनचर्या में लौट आए।
यथार्थ
सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, सेक्टर 88, फरीदाबाद के सीनियर कंसल्टेंट एंड एच.ओ.डी
– इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी एवं इलेक्ट्रोफिज़ियोलॉजी, डॉ. बिनय कुमार ने कहा,
“ये दोनों केस इस बात का उदाहरण हैं कि TAVI और वाल्व-इन-वाल्व जैसी आधुनिक तकनीकें
बुजुर्ग और उच्च जोखिम वाले मरीजों के लिए जीवनदायी साबित हो सकती हैं। आधुनिक तकनीक
और टीम आधारित दृष्टिकोण से हम उन मरीजों को सुरक्षित और प्रभावी विकल्प दे पा रहे
हैं, जिन्हें पारंपरिक सर्जरी से लाभ मिलना संभव नहीं होता।”
इन
उपलब्धियों से एक बार फिर सिद्ध होता है कि यथार्थ हॉस्पिटल, फरीदाबाद जटिल हृदय रोगों
के उन्नत उपचार में उत्कृष्टता का केंद्र है और सभी आयु वर्ग के मरीजों को विश्वस्तरीय
हृदय सेवाएँ प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है
Dr Mahipal Singh Sachdev, Chairman & Managing Director, Centre For Sight Group of Eye Hospitals
On the occasion of National Myopia Week, Centre for Sight Group of Eye Hospitals, highlighted the rising burden of Myopia, which has become one of the fastest-growing global eye-health challenges, affecting an increasing number of children and young adults. Over the past few decades, its prevalence has risen sharply—driven by lifestyle factors such as prolonged screen exposure, reduced outdoor time, intense near-work demands and academic pressures, myopia is being detected at younger ages and progressing more rapidly than ever before.
Eye-care experts around the world are sounding the alarm about the rapid rise in myopia and emphasize that the real threat lies not in mild myopia, which can be corrected easily with glasses, but in high myopia, which significantly increases the risk of sight threatening complications like retinal detachment, myopic macular degeneration, early cataract formation, glaucoma, & Irreversible vision loss later in life.
Globally, myopia has become a public health challenge, with projections indicating that by 2050 nearly 50% of the world’s population will be myopic. What makes this trend especially concerning is the early onset of myopia in children, which significantly increases the risk of high myopia later in life, which is associated with sight threatening complications.
India is witnessing a parallel rise, especially among school children. According to recent national estimates, almost one in three children may develop myopia if preventive measures are not implemented early. The window for controlling its progression is narrow, making timely screening, regular eye check-ups, and mindful lifestyle planning essential.”
Myopia is no longer just a simple refractive error but a condition that needs structured monitoring. Children spending excessive time on digital devices, studying indoors for long hours, or lacking outdoor activities are at high risk. Even mild symptoms like frequent blinking, squinting, headaches, or difficulty seeing the board at school—should prompt an immediate eye examination. Regular screening every six months for children and annual check-ups for adults can make a significant difference in managing the condition effectively.
Given these risks, early screening has become more critical than ever. School-based vision programs, portable screening technologies, and digital autorefractors are making detection more accessible. Identifying myopia early allows clinicians to initiate interventions during a child’s most rapid eye-growth years, when treatments are most effective.
The good news is that modern ophthalmology now offers several advanced and clinically proven methods to slow or control myopia progression. Current management of myopia focuses not only on correcting vision but also on slowing eye elongation—the underlying cause of progression. Innovations over the past decade have expanded the range of evidence-based options such as atropine therapy, specialised myopia-control spectacles, orthokeratology lenses, peripheral-defocus contact lenses, and lifestyle interventions like increasing outdoor time has emerged as one of the most powerful, low-cost interventions. Studies consistently show that 90–120 minutes of natural light exposure per day can significantly reduce the onset of myopia. Limiting prolonged near-work, encouraging balanced visual habits, and improving classroom lighting also contribute meaningfully to prevention.
For adults with stable myopia, procedures like ReLEx SMILE, Femto-LASIK, and advanced ICL technologies provide safe and effective long-term correction. These advancements allow personalised treatment planning depending on age, severity, progression rate, and eye health stability. The earlier myopia management begins, the greater the chance of preserving long-term vision quality.”
Myopia has emerged as a silent but significant eye-health concern, especially among our younger population. What makes it challenging is that it progresses quietly and is often ignored until it affects day to day activities.
Early detection can completely change the outcome—because today we have scientific, globally approved myopia-control solutions that can slow progression and protect long-term vision. Parents, educators, and caregivers must recognise that timely check-ups and lifestyle corrections are not optional; they are the strongest defence we have in preventing future vision impairment.
While the rise in myopia presents a significant challenge, modern treatments and early screening provide powerful tools to combat it. With timely detection, evidence-based interventions, and supportive lifestyle changes, the trajectory of childhood myopia can be meaningfully altered. Today, children facing the risk of myopia have more options—and more hope—than ever before. However, advances in early screening and modern treatment strategies are now offering new optimism for slowing or even preventing its progression.,
This National Myopia Week serves as a reminder that eye health must be prioritised as part of overall well-being. With awareness, preventive care, and access to advanced treatment options, India can successfully reduce the long-term burden of myopia and safeguard the vision of future generations.